इजरायल की राजनीति में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता और भविष्य को लेकर बहस तेज है। पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट समेत कई विपक्षी नेता उनके लिए चुनौती पेश कर रहे हैं। सुरक्षा व्यवस्था, गाजा युद्ध, सेना में अनिवार्य भर्ती, न्यायिक सुधार और बढ़ती महंगाई जैसे मुद्दे चुनावी चर्चा के केंद्र में हैं। इस चुनाव का महत्व केवल इजरायल तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के साथ उसके रक्षा और रणनीतिक संबंधों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
नेतन्याहू लंबे समय से इजरायल की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं। हालांकि, 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद देश की सुरक्षा व्यवस्था और सरकार की जवाबदेही को लेकर उन पर सवाल उठते रहे हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि इन घटनाओं की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
दूसरी ओर, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट अपने सैन्य अनुभव के आधार पर मतदाताओं के बीच विकल्प के रूप में सामने आए हैं। उनके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट, एविगडोर लिबरमैन और याइर गोलान जैसे नेता भी नेतन्याहू की नीतियों का विरोध करते रहे हैं।
नेतन्याहू से लेकर आइजनकोट तक, इजरायल की राजनीति के बड़े चेहरे
बेंजामिन नेतन्याहू के सामने सत्ता बचाने की चुनौती
बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल हैं। उनकी लिकुड पार्टी दक्षिणपंथी राजनीति की प्रमुख ताकत मानी जाती है। उनके समर्थक उन्हें सुरक्षा और सैन्य मामलों का अनुभवी नेता बताते हैं।
हालांकि, हमास के हमले से पहले हुई सुरक्षा संबंधी चूक और गाजा में युद्ध को संभालने के तरीके को लेकर उनकी सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। नेतन्याहू के लिए अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत बनाए रखना और सहयोगी दलों का समर्थन हासिल करना अहम चुनौती है।
गादी आइजनकोट बन सकते हैं विपक्ष का प्रमुख विकल्प
पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट इजरायल की राजनीति में सुरक्षा विशेषज्ञता के लिए पहचाने जाते हैं। वह 7 अक्टूबर के हमलों के बाद सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा और जवाबदेही तय करने की मांग उठाते रहे हैं।
आइजनकोट पहले नेतन्याहू की युद्ध कैबिनेट का हिस्सा थे, लेकिन बाद में सरकार की नीतियों से मतभेद के चलते अलग हो गए। उनकी सैन्य पृष्ठभूमि और सुरक्षा संबंधी अनुभव उन्हें विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल करते हैं।
नफ्ताली बेनेट और दूसरे नेताओं की भूमिका
पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी नेतन्याहू के खिलाफ राजनीतिक मोर्चे पर सक्रिय रहे हैं। एविगडोर लिबरमैन और याइर गोलान जैसे नेताओं की भूमिका भी चुनाव के बाद सरकार गठन में महत्वपूर्ण हो सकती है।
इन नेताओं की विचारधारा और नीतियों में अंतर है, लेकिन नेतन्याहू के विरोध में व्यापक गठबंधन बनाने की संभावनाएं उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकती हैं। वहीं, इतामार बेन-ग्विर जैसे दक्षिणपंथी नेता नेतन्याहू के सहयोगी खेमे के लिए अहम हैं।
इजरायल में सरकार बनाने के लिए कितनी सीटें जरूरी हैं?
इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। यहां कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए।
इजरायल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू है। इसके तहत राजनीतिक दलों को मिलने वाले वोटों के आधार पर संसद में सीटें मिलती हैं। कई दलों के बीच सीटों का बंटवारा होने के कारण सरकार बनाने के लिए गठबंधन की जरूरत पड़ती है।
यदि कोई भी राजनीतिक खेमा बहुमत हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन के लिए अलग-अलग दलों के बीच बातचीत शुरू होती है। गठबंधन बनाने में विफलता की स्थिति में राजनीतिक संकट गहरा सकता है और दोबारा चुनाव कराने की नौबत भी आ सकती है।
इजरायल चुनाव में इन मुद्दों पर टिकी हैं मतदाताओं की नजरें
सुरक्षा व्यवस्था और हमास के हमले
इजरायल में राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दों में शामिल है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों ने देश की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
विपक्ष सरकार से इस मामले में जवाबदेही तय करने की मांग करता है। वहीं, नेतन्याहू के समर्थक सरकार की सैन्य कार्रवाइयों और सुरक्षा नीतियों का बचाव करते हैं। गाजा और पड़ोसी क्षेत्रों में जारी तनाव के कारण यह मुद्दा और महत्वपूर्ण हो गया है।
सैन्य सेवा में छूट को लेकर विवाद
इजरायल में अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के कुछ पुरुषों को धार्मिक अध्ययन के आधार पर सैन्य सेवा से छूट देने की व्यवस्था लंबे समय से बहस का विषय रही है।
लगातार सैन्य अभियानों के कारण सेना पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में सैन्य सेवा की जिम्मेदारी सभी समुदायों के बीच समान रूप से बांटने की मांग तेज हुई है। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद बने हुए हैं।
न्यायिक सुधार पर राजनीतिक टकराव
न्यायपालिका की शक्तियों और न्यायिक सुधारों को लेकर इजरायल में पहले भी बड़े विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं। सरकार के आलोचकों का मानना है कि प्रस्तावित बदलाव अदालतों की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं।
वहीं, इन सुधारों के समर्थक इन्हें न्यायिक व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता से जोड़ते हैं। चुनाव के बाद यह मुद्दा नई सरकार की नीतियों और गठबंधन की बातचीत को प्रभावित कर सकता है।
महंगाई और बढ़ता घरेलू खर्च
आम लोगों के लिए महंगाई, मकानों का किराया और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें भी प्रमुख चिंताएं हैं। लंबे समय तक संघर्ष चलने से सरकारी खर्च, निवेश और कारोबार पर दबाव बढ़ सकता है।
नई सरकार के सामने राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ आर्थिक स्थिरता बनाए रखने और नागरिकों को राहत देने की चुनौती भी होगी।
भारत के लिए इजरायल चुनाव क्यों है अहम?
भारत और इजरायल के संबंध पिछले कई वर्षों में मजबूत हुए हैं। दोनों देश रक्षा, कृषि, साइबर सुरक्षा, विज्ञान, तकनीक और व्यापार के क्षेत्रों में सहयोग करते हैं।
इजरायल में बनने वाली नई सरकार की नीतियां इन क्षेत्रों में जारी परियोजनाओं और भविष्य के समझौतों को प्रभावित कर सकती हैं। भारत के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव के बाद द्विपक्षीय सहयोग किस दिशा में आगे बढ़ता है।
रक्षा समझौतों और हथियारों की आपूर्ति पर नजर
इजरायल भारत के प्रमुख रक्षा साझेदारों में शामिल है। दोनों देशों के बीच मिसाइल प्रणालियों, ड्रोन, निगरानी उपकरणों और अन्य सैन्य तकनीकों को लेकर सहयोग रहा है।
कारगिल युद्ध के बाद भारत और इजरायल के रक्षा संबंधों में तेजी से विस्तार हुआ। आधुनिक हथियार प्रणालियों और तकनीकी सहयोग के कारण यह साझेदारी भारत की सुरक्षा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है।
नई सरकार की नीतियों का असर रक्षा समझौतों के क्रियान्वयन, तकनीक हस्तांतरण और संयुक्त उत्पादन की योजनाओं पर पड़ सकता है। भारत की आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन नीति के लिहाज से भी इन संबंधों की अहमियत बनी हुई है।
मोदी और नेतन्याहू के रिश्तों का कितना महत्व?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच करीबी संबंध रहे हैं। दोनों नेताओं के कार्यकाल में रक्षा, कृषि, तकनीक और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा मिला है।
हालांकि, भारत-इजरायल साझेदारी केवल दोनों नेताओं के व्यक्तिगत रिश्तों पर आधारित नहीं है। संस्थागत सहयोग, आर्थिक हित और पहले से किए गए समझौते भी इसे मजबूत बनाते हैं।
इसलिए इजरायल में नेतृत्व बदलने की स्थिति में भी दोनों देशों के बीच सहयोग जारी रहने की संभावना है। महत्वपूर्ण यह होगा कि नई सरकार भारत के साथ मौजूदा परियोजनाओं को किस तरह आगे बढ़ाती है।
पश्चिम एशिया का संघर्ष और भारत की ऊर्जा जरूरतें
पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है। भारत कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने पर तेल की कीमतों और समुद्री परिवहन लागत में बदलाव हो सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर जैसे समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन रास्तों पर सुरक्षा संबंधी संकट का असर भारत के आयात और माल ढुलाई पर भी पड़ सकता है।
इसके अतिरिक्त, खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं। उनकी सुरक्षा, रोजगार और आर्थिक हित भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। इजरायल की नई सरकार ईरान और गाजा के संबंध में क्या नीति अपनाती है, इसका असर पूरे क्षेत्र की परिस्थितियों पर पड़ सकता है।
फलस्तीन और IMEC कॉरिडोर का भविष्य
भारत इजरायल के साथ संबंध मजबूत करने के साथ-साथ फलस्तीन के स्वतंत्र राज्य के समाधान का समर्थन करता रहा है। क्षेत्र में शांति और स्थिरता भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल हैं।
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा यानी IMEC एक प्रस्तावित परियोजना है, जिसका उद्देश्य भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच व्यापारिक संपर्क बेहतर बनाना है।
इस परियोजना की प्रगति क्षेत्रीय स्थिरता और संबंधित देशों के सहयोग पर निर्भर करेगी। यदि इजरायल और अरब देशों के संबंध बेहतर होते हैं, तो व्यापार और परिवहन के नए अवसर विकसित हो सकते हैं। इसके विपरीत, क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ने से परियोजना की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।
चुनाव के बाद क्या होगा और भारत को किस बात का इंतजार?
चुनाव के बाद इजरायल में सरकार गठन की प्रक्रिया पर सबकी नजर रहेगी। राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग राजनीतिक दलों से परामर्श करने के बाद उस नेता को सरकार बनाने का अवसर दे सकते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की बेहतर संभावना हो।
यदि कोई गठबंधन 61 सांसदों का समर्थन हासिल कर लेता है, तो नई सरकार का गठन संभव होगा। ऐसा नहीं होने पर राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ सकती है और नए चुनाव की संभावना पैदा हो सकती है।
भारत के लिए इस चुनाव का महत्व रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया में शांति से जुड़ा है। हालांकि, द्विपक्षीय संबंधों पर वास्तविक असर नई सरकार की नीतियों और क्षेत्रीय घटनाक्रमों के आधार पर ही स्पष्ट होगा।



















