(शरदेन्द्र तिवारी/जनवीणा)
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि असली मुकाबला विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने ही घर के भीतर से शुरू होता है। बाराबंकी की दरियाबाद सीट पर उभरता यह नया घटनाक्रम इसी कहावत को एक बार फिर जीवंत कर रहा है। एक तरफ प्रदेश सरकार में स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री के रूप में अपनी सशक्त पहचान बना चुके सतीश चंद्र शर्मा हैं, तो दूसरी ओर उसी दल के प्रभावशाली नेता प्रमोद तिवारी (यहाँ संदर्भ भाजपा नेता से है) ने खुलकर चुनौती पेश कर दी है। यह केवल टिकट की दावेदारी नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की सीधी लड़ाई है।
दरअसल, सतीश शर्मा का राजनीतिक सफर किसी सामान्य नेता का नहीं रहा। 2017 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के कद्दावर चेहरे को हराकर एक बड़ा उलटफेर किया और 2022 में अपनी जीत दोहराकर यह साबित किया कि उनकी पकड़ केवल परिस्थितिजन्य नहीं, बल्कि जनाधार पर आधारित है। मंत्री पद तक पहुंचना उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रमाण है। ऐसे में उनका कद केवल एक विधायक का नहीं, बल्कि एक स्थापित क्षेत्रीय शक्ति का बन चुका है।
लेकिन राजनीति में स्थायित्व सबसे बड़ा भ्रम होता है। प्रमोद तिवारी का मैदान में उतरना इसी भ्रम को तोड़ने का संकेत है। गांव-गांव, घर-घर जाकर जनता से संवाद, स्थानीय मुद्दों पर सीधी पकड़ और संगठन के भीतर सक्रियता..ये सभी संकेत देते हैं कि यह चुनौती औपचारिक नहीं, बल्कि पूरी तैयारी के साथ दी गई है। खास बात यह है कि उनकी रणनीति केवल टिकट पाने तक सीमित नहीं दिखती, बल्कि वे खुद को एक वैकल्पिक जननेता के रूप में स्थापित करने की दिशा में बढ़ रहे हैं।
यहाँ असली प्रश्न यह नहीं है कि टिकट किसे मिलेगा, बल्कि यह है कि पार्टी किस रणनीति को प्राथमिकता देगी…अनुभव और सिद्ध जीत का रिकॉर्ड, या फिर नई ऊर्जा और उभरती लोकप्रियता? सतीश शर्मा के पास अनुभव, प्रशासनिक पकड़ और जीत का इतिहास है, जबकि प्रमोद तिवारी के पास जमीनी सक्रियता, नए समीकरण और सामाजिक संपर्क का विस्तार है।
दरियाबाद की राजनीति में जातीय समीकरण भी हमेशा से निर्णायक रहे हैं। ब्राह्मण समाज में पकड़, अन्य वर्गों के साथ संतुलन और स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता..ये तीनों ही फैक्टर इस बार और अधिक अहम हो गए हैं। प्रमोद तिवारी जहां ब्राह्मण वोट बैंक में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं सतीश शर्मा का व्यापक जनाधार उन्हें अभी भी बढ़त देता नजर आता है।
परंतु सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह मुकाबला विपक्षी दलों के लिए भी अवसर बन सकता है। यदि आंतरिक खींचतान बढ़ती है, तो इसका सीधा लाभ तीसरे खिलाड़ी को मिल सकता है। इसलिए पार्टी नेतृत्व के लिए यह केवल एक सीट का फैसला नहीं, बल्कि संगठनात्मक संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है।
अंततः, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दरियाबाद की यह लड़ाई केवल दो नेताओं के बीच नहीं, बल्कि दो राजनीतिक शैलियों के बीच है..एक स्थापित सत्ता का आत्मविश्वास और दूसरा उभरती चुनौती का आक्रामक उत्साह। आने वाला समय तय करेगा कि जनता अनुभव के साथ खड़ी होती है या बदलाव के साथ।
लेकिन एक बात स्पष्ट है..बाराबंकी की यह सियासत अब शांत नहीं रहने वाली। यहाँ हर कदम, हर बयान और हर जनसंपर्क अभियान आने वाले बड़े राजनीतिक समीकरणों की पटकथा लिख रहा है।
और शायद यही लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत सच्चाई भी है.. जहाँ चुनौती ही नेतृत्व को परखती है।



















