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पाकिस्तान-अफगानिस्तान जंग: क्या इसकी जड़ें अंग्रेजों के दौर में हैं?

JANVEENA by JANVEENA
February 28, 2026
in विदेश
0
पाकिस्तान-अफगानिस्तान जंग: क्या इसकी जड़ें अंग्रेजों के दौर में हैं?

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच टकराव ने खुली जंग का रूप ले लिया है। दोनों देशों की वायु सेनाएं एक-दूसरे के ठिकानों पर हमले कर रही हैं और सीमा क्षेत्र में भारी गोलाबारी की खबरें हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे को बड़े नुकसान पहुंचाने के दावे कर रहे हैं। सवाल उठ रहा है—इस संघर्ष की असली वजह क्या है? क्या इसकी जड़ें औपनिवेशिक दौर में खींची गई सीमा से जुड़ी हैं?


मौजूदा टकराव की पृष्ठभूमि

तनाव की हालिया कड़ी की शुरुआत उस समय मानी जा रही है जब अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद पाकिस्तान-विरोधी गुटों को नई सक्रियता मिली। खासकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने पाकिस्तान के भीतर हमले तेज किए।

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पाकिस्तान का आरोप है कि टीटीपी को अफगान क्षेत्र से समर्थन या पनाह मिलती है, जबकि अफगान पक्ष इन आरोपों से इनकार करता रहा है। इसी अविश्वास ने सीमा झड़पों को बढ़ाया और मामला सैन्य टकराव तक पहुंच गया।


टीटीपी की भूमिका

टीटीपी का गठन 2007 में हुआ था। यह संगठन पाकिस्तान में शरिया कानून लागू करने, संवैधानिक ढांचे को बदलने और कबायली इलाकों से सेना हटाने जैसी मांगें उठाता रहा है।

15 अगस्त 2021 को जब तालिबान ने अफगानिस्तान में सत्ता संभाली, तो अफगान जेलों में बंद कई टीटीपी कैदी रिहा हुए। इसके बाद पाकिस्तान में हमलों की घटनाएं बढ़ीं। इसने दोनों देशों के रिश्तों को और तनावपूर्ण बना दिया।


क्या डूरंड लाइन है असली वजह?

इतिहास में जाएं तो विवाद की एक बड़ी जड़ 1893 में खींची गई सीमा—डूरंड लाइन—मानी जाती है। यह सीमा ब्रिटिश भारत और अफगान अमीर के बीच समझौते से तय हुई थी।

1947 में पाकिस्तान के गठन के बाद उसे यही सीमा विरासत में मिली। लेकिन अफगानिस्तान के कई राजनीतिक वर्गों ने इसे औपनिवेशिक थोप मानते हुए पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।

इस सीमा ने पश्तून समुदाय को दो हिस्सों में बांट दिया—कुछ पाकिस्तान में, कुछ अफगानिस्तान में। “पश्तूनिस्तान” का विचार भी समय-समय पर उभरता रहा, जिसने रिश्तों में अविश्वास बढ़ाया।


ऐतिहासिक समझौते

  • 1893: ब्रिटिश शासन और अफगान अमीर के बीच सीमा निर्धारण समझौता।

  • 1919: रावलपिंडी समझौते के बाद अफगानिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता।

  • 1947 के बाद: पाकिस्तान ने डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा माना, जबकि अफगानिस्तान में इस पर मतभेद जारी रहे।

इन ऐतिहासिक घटनाओं ने सीमा विवाद को स्थायी संवेदनशील मुद्दा बना दिया।


क्या सिर्फ अंग्रेज जिम्मेदार?

विश्लेषकों का मानना है कि औपनिवेशिक सीमा विवाद एक अहम कारण जरूर है, लेकिन मौजूदा जंग केवल उसी की देन नहीं है।

आज के संघर्ष में शामिल हैं:

  • टीटीपी और सीमा पार आतंकवाद के आरोप

  • पारस्परिक अविश्वास

  • क्षेत्रीय शक्ति संतुलन

  • आंतरिक राजनीतिक दबाव

यानी इतिहास ने जमीन तैयार की, लेकिन मौजूदा हालात को भड़काने में वर्तमान राजनीतिक और सुरक्षा समीकरणों की भी बड़ी भूमिका है।


आगे क्या?

रूस ने दोनों देशों से तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने और बातचीत शुरू करने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख ने भी राजनीतिक समाधान पर जोर दिया है। तुर्की और कतर जैसे देश मध्यस्थता की कोशिश कर सकते हैं।

हालांकि, दोनों पक्षों की कड़ी बयानबाजी से फिलहाल शांति की संभावना कम नजर आती है। यह संघर्ष कितना लंबा चलेगा, यह आने वाले कूटनीतिक प्रयासों और सैन्य हालात पर निर्भर करेगा।


निष्कर्ष

पाकिस्तान-अफगानिस्तान जंग की जड़ें इतिहास में जरूर मिलती हैं, खासकर डूरंड लाइन के विवाद में। लेकिन आज का टकराव कई समकालीन सुरक्षा और राजनीतिक कारणों का परिणाम है। इसलिए इसे केवल “अंग्रेजों की देन” कहकर समझना अधूरा होगा।

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