BRICS देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की कोशिशों के बीच पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने समूह के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। अमेरिका और उसके सहयोगियों के वर्चस्व वाली वैश्विक व्यवस्था में बदलाव की कोशिश कर रहे BRICS देशों के लिए मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियां एक बड़ी परीक्षा बन गई हैं।
एक ओर चीन, रूस, भारत और ब्राजील जैसे देश BRICS के जरिए वैश्विक अर्थव्यवस्था में पश्चिमी देशों पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। वहीं दूसरी ओर समूह के कुछ सदस्य देशों के अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक और सुरक्षा संबंध हैं। ऐसे में युद्ध और ऊर्जा संकट के बीच BRICS के सभी देशों के हितों को एक दिशा में रखना आसान नहीं है।
होर्मुज संकट ने बढ़ाई BRICS की चिंता
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का असर ऊर्जा बाजार पर भी पड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही को लेकर पैदा हुई स्थिति ने दुनिया के प्रमुख तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है।
ईरान BRICS का सदस्य है और वह यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह अलग-थलग नहीं हुआ है। चीन जैसे देशों के साथ उसके आर्थिक संबंध इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
हालांकि, होर्मुज के रास्ते ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका BRICS के उन देशों के लिए चिंता का विषय है, जिनकी अर्थव्यवस्था स्थिर और सस्ती ऊर्जा आपूर्ति पर काफी निर्भर है।
BRICS में ही अलग-अलग रणनीतिक हित
BRICS की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि समूह में शामिल देशों की विदेश नीति और सुरक्षा प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। चीन, रूस और ईरान इस संगठन को पश्चिमी वर्चस्व के विकल्प के तौर पर मजबूत करने की दिशा में देख सकते हैं, लेकिन कई अन्य सदस्य देशों के अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं।
संयुक्त अरब अमीरात अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग रखने वाले देशों में शामिल है। वहीं मिस्र को लंबे समय से अमेरिका के साथ सैन्य और रणनीतिक संबंधों से फायदा मिलता रहा है। ऐसे में इन देशों के लिए BRICS की भूमिका को सीधे तौर पर अमेरिकी प्रभाव के विकल्प के रूप में पेश करना आसान नहीं होगा।
यही वजह है कि समूह के भीतर आर्थिक सहयोग और पश्चिमी निर्भरता कम करने पर सहमति बन सकती है, लेकिन सुरक्षा और विदेश नीति जैसे संवेदनशील मुद्दों पर एक जैसी रणनीति बनाना चुनौतीपूर्ण रहेगा।
भारत के लिए संतुलन साधना अहम
BRICS सम्मेलन भारत के लिए भी कूटनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण है। भारत एक तरफ चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में है, वहीं रूस के साथ उसके पुराने और मजबूत संबंध हैं। दूसरी तरफ अमेरिका के साथ भी भारत के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुए हैं।
ऐसे में भारत के सामने चुनौती यह होगी कि वह BRICS के भीतर अपनी भूमिका को मजबूत करते हुए किसी एक धड़े के साथ पूरी तरह खड़ा दिखाई न दे। रूस के साथ संबंध बनाए रखना और साथ ही अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाना भारत की विदेश नीति के लिए संतुलन का विषय रहेगा।
ऊर्जा सुरक्षा भी भारत के लिए अहम मुद्दा है। तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी भारतीय अर्थव्यवस्था और आयात बिल पर सीधा असर डाल सकती है। इसलिए पश्चिम एशिया में स्थिरता और तेल की निर्बाध आपूर्ति भारत के हित में है।
ईरान सम्मेलन में क्या हासिल करना चाहेगा?
ईरान के लिए BRICS बैठक अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर हो सकती है। वह यह दिखाना चाहेगा कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद उसके पास ऐसे देश मौजूद हैं, जिनके साथ वह व्यापार और आर्थिक संबंध जारी रख सकता है।
चीन ईरान के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदारों में शामिल है और दोनों देशों के बीच ऊर्जा कारोबार भी महत्वपूर्ण है। भारत और रूस के साथ ईरान के संबंध भी उसके लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं।
हालांकि, होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान का रुख BRICS के भीतर मतभेद पैदा कर सकता है। यदि तेल की आवाजाही प्रभावित होती है तो इसका असर समूह के कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
पुतिन के लिए पश्चिम को संदेश देने का मौका
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए BRICS मंच पश्चिमी देशों को अपनी कूटनीतिक स्थिति दिखाने का महत्वपूर्ण अवसर है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस ने चीन, भारत और ब्राजील जैसे देशों के साथ अपने आर्थिक संबंधों को बनाए रखा है।
रूस के लिए चीन एक महत्वपूर्ण कारोबारी साझेदार बना हुआ है। भारत रूसी ऊर्जा का बड़ा खरीदार रहा है, जबकि ब्राजील और रूस के बीच कृषि और उर्वरक से जुड़े व्यापारिक संबंध हैं।
पुतिन इन संबंधों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश कर सकते हैं कि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस के पास अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति के लिए दूसरे विकल्प मौजूद हैं।
शी जिनपिंग के लिए भी अहम मंच
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए भी BRICS बैठक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। चीन लंबे समय से वैश्विक संस्थानों में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने की वकालत करता रहा है।
BRICS के मंच से चीन यह संदेश देने की कोशिश कर सकता है कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था केवल अमेरिका तथा उसके सहयोगी देशों के इर्द-गिर्द सीमित नहीं है। समूह के सदस्य देशों की बड़ी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी चीन के इस तर्क को मजबूती देती है।
आने वाले समय में अमेरिका और चीन के बीच होने वाली उच्चस्तरीय बातचीत से पहले BRICS का मंच शी जिनपिंग के लिए अपनी कूटनीतिक स्थिति मजबूत करने का अवसर भी बन सकता है।
एकता के दावे की होगी असली परीक्षा
BRICS में दुनिया की करीब आधी आबादी रहती है और समूह की वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी है। इसके बावजूद संगठन के सभी सदस्यों के राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा हित अलग-अलग हैं।
यही वजह है कि पश्चिमी वर्चस्व के विकल्प के तौर पर BRICS को मजबूत करने की कोशिश के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी आंतरिक एकता है। युद्ध, तेल की कीमतें, ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिका के साथ अलग-अलग देशों के संबंध यह तय करेंगे कि BRICS वास्तव में एक साझा रणनीतिक शक्ति के रूप में कितना आगे बढ़ पाता है।



















