सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक की एक पीड़िता के इलाज को लेकर अहम निर्देश जारी करते हुए दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल को उसका पूरा उपचार जारी रखने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता को तब तक अस्पताल से छुट्टी नहीं दी जाए, जब तक उसकी हालत इतनी बेहतर न हो जाए कि वह अस्पताल से जाने के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट हो। इलाज पर होने वाले खर्च को लेकर भी अदालत ने अस्पताल को स्पष्ट निर्देश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थीं। यह मामला एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास और सहायता के लिए काम करने वाले संगठन ब्रेव सोल्स फाउंडेशन की ओर से अदालत के सामने उठाया गया था।
संगठन की प्रमुख शाहीन मलिक ने अदालत को बताया कि पीड़िता पर 6 अक्टूबर को दिल्ली के भजनपुरा इलाके में एसिड से हमला किया गया था। इस घटना में महिला का लगभग 45 प्रतिशत शरीर झुलस गया था। हमले के बाद से ही उसे बेहतर इलाज दिलाने के लिए परिवार को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था।
अस्पताल को सभी जरूरी चिकित्सा सुविधाएं देने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सर गंगा राम अस्पताल के प्रबंधन को निर्देश दिया कि पीड़िता को भर्ती रखकर उसकी जरूरत के अनुसार सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। अदालत ने दवाओं, प्लास्टिक सर्जरी और अन्य जरूरी उपचार में किसी तरह की कमी नहीं होने देने को कहा।
पीठ ने स्पष्ट किया कि पीड़िता का उपचार तब तक जारी रहना चाहिए, जब तक वह अस्पताल से छुट्टी पाने के लिए चिकित्सकीय रूप से सक्षम न हो जाए और उसे केवल बाह्य रोगी विभाग यानी ओपीडी में उपचार की जरूरत न रह जाए।
अदालत ने अस्पताल को इलाज पर होने वाले खर्च का बिल भी न्यायालय में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। इस आदेश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक परेशानियों के कारण पीड़िता के उपचार में कोई बाधा न आए।
मुफ्त इलाज के अधिकार के बावजूद सामने आईं परेशानियां
मामले में याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि एसिड अटैक पीड़ितों को कानून के तहत मुफ्त उपचार का अधिकार प्राप्त है, इसके बावजूद महिला को उचित चिकित्सा सुविधा हासिल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
शाहीन मलिक के अनुसार, सर गंगा राम अस्पताल और अपोलो अस्पताल में बर्न वार्ड की सुविधा उपलब्ध नहीं होने का हवाला देते हुए इलाज से संबंधित समस्याएं सामने आई थीं। इसके बाद पीड़िता और उसके परिवार को दूसरे अस्पतालों में भी जाना पड़ा।
इस स्थिति को लेकर संगठन ने अदालत से हस्तक्षेप करने की मांग की। सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के उपचार को प्राथमिकता देने और अस्पताल में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
एसिड अटैक पीड़ितों के लिए कानून में क्या प्रावधान है?
याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 397 का उल्लेख किया गया। इस प्रावधान के तहत एसिड अटैक पीड़ितों को सरकारी और निजी अस्पतालों में तत्काल प्राथमिक चिकित्सा तथा मुफ्त उपचार उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हमले के बाद पीड़ित को आर्थिक स्थिति या अस्पताल संबंधी समस्याओं के कारण जरूरी इलाज से वंचित न रहना पड़े। एसिड अटैक के मामलों में समय पर उपचार, घावों की देखभाल और जरूरत के अनुसार सर्जरी बेहद महत्वपूर्ण होती है।
मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को पीड़िता के उपचार के अधिकार और अस्पतालों की जिम्मेदारी से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
हमले के बाद कई अस्पतालों में जाना पड़ा
पीड़िता की मां ने बताया कि हमले के बाद उनकी बेटी को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाना पड़ा। पुलिस कंट्रोल रूम की सहायता से सबसे पहले उसे दिल्ली के जग प्रवेश चंद्र अस्पताल पहुंचाया गया। वहां से आगे के उपचार के लिए गुरु तेग बहादुर (जीटीबी) अस्पताल भेज दिया गया।
मां के अनुसार, इस दौरान उन्हें और उनकी बेटी को काफी मानसिक और शारीरिक परेशानी झेलनी पड़ी। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी बेटी तेज दर्द से परेशान रहती थी और परिवार को उसकी तकलीफ कम करने के लिए लगातार प्रयास करने पड़ रहे थे।
उन्होंने बताया कि गुरुवार दोपहर को बेटी को जीटीबी अस्पताल से छुट्टी दिलाकर सर गंगा राम अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद परिवार को उसके उपचार को लेकर लगातार चिंता बनी रही। मां का कहना था कि उनकी कोशिश केवल इतनी थी कि बेटी को उचित इलाज मिल सके और उसकी स्थिति में सुधार हो।
दवाएं बाहर से खरीदने के लिए कहने का आरोप
पीड़िता की मां ने आरोप लगाया कि सर गंगा राम अस्पताल में शुक्रवार रात कर्मचारियों ने परिवार से दवाएं बाहर से खरीदने के लिए कहा था। कथित तौर पर उन्हें बताया गया कि अस्पताल में आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं हैं।
मां के मुताबिक, जब उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए दवाएं खरीदने में असमर्थता जताई, तो शनिवार सुबह परिवार को पीड़िता को किसी अन्य अस्पताल में ले जाने की सलाह दी गई। इसके बाद मामले ने गंभीर रूप ले लिया और पीड़िता के उपचार को लेकर कानूनी हस्तक्षेप की जरूरत पड़ी।
हालांकि, जीटीबी अस्पताल के अतिरिक्त निदेशक डॉ. प्रवीण कुमार ने उपचार में लापरवाही के आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि अस्पताल ने मरीज की जरूरत के अनुसार इलाज उपलब्ध कराया था। उनके मुताबिक, परिवार अपनी पसंद के अस्पताल में आगे का उपचार कराना चाहता था, इसलिए मरीज को वहां से छुट्टी दिलाई गई।
इस तरह मामले में परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों और अस्पताल प्रशासन के पक्ष के बीच अंतर सामने आया है।
एसिड की बिक्री पर भी उठे सवाल
ब्रेव सोल्स फाउंडेशन की प्रमुख शाहीन मलिक ने एसिड की बिक्री और उसकी उपलब्धता पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों और नियमों के बावजूद एसिड की बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि गंभीर रूप से घायल पीड़िता को इलाज दिलाने के लिए परिवार को इतनी कठिनाइयों का सामना क्यों करना पड़ा। उनके अनुसार, पीड़ितों को उपचार के लिए कई अस्पतालों के चक्कर लगाने की स्थिति नहीं बननी चाहिए।
मलिक ने कहा कि पीड़िता को उसका अधिकार दिलाने के लिए संगठन और वकीलों को हस्तक्षेप करना पड़ा तथा मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। उन्होंने एसिड अटैक पीड़ितों के लिए बेहतर चिकित्सा व्यवस्था और प्रभावी सहायता तंत्र की जरूरत पर जोर दिया।
पीड़ितों के अधिकार और अस्पतालों की जिम्मेदारी पर अहम सवाल
इस मामले ने एक बार फिर एसिड अटैक पीड़ितों को समय पर और मुफ्त उपचार उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित किया है। ऐसे मामलों में शुरुआती चिकित्सा सहायता से लेकर प्लास्टिक सर्जरी, दवाओं और पुनर्वास तक लगातार देखभाल की जरूरत हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने सर गंगा राम अस्पताल को पीड़िता का उपचार जारी रखने और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश देकर तत्काल चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करने पर जोर दिया है। अब इस मामले में अदालत के निर्देशों के अनुपालन और पीड़िता के आगे के उपचार पर नजर रहेगी।



















