एक ही घर में रहने वाले लोगों का खानपान, रहन-सहन और आसपास का वातावरण काफी हद तक समान होता है। इसके बावजूद परिवार के अलग-अलग सदस्यों को अलग-अलग बीमारियां क्यों होती हैं? किसी को डायबिटीज हो जाती है, तो कोई दिल की बीमारी से परेशान रहता है। वहीं, कुछ लोगों में कैंसर, हाई ब्लड प्रेशर या थायराइड जैसी समस्याएं सामने आती हैं। इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) एक विशेष शोध अध्ययन करने जा रहा है।
इस रिसर्च के जरिए वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करेंगे कि समान पारिवारिक पृष्ठभूमि और मिलते-जुलते वातावरण में रहने के बाद भी लोगों की सेहत पर अलग-अलग प्रभाव क्यों पड़ता है। अध्ययन में आनुवंशिक बनावट, जीवनशैली और पर्यावरण से जुड़े पहलुओं की भूमिका को समझने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
200 परिवारों को अध्ययन में किया जाएगा शामिल
इस शोध परियोजना के तहत देश के अलग-अलग हिस्सों से करीब 200 परिवारों का चयन करने की योजना है। इन परिवारों के सदस्यों की लगभग चार साल तक निगरानी और स्वास्थ्य संबंधी अध्ययन किया जाएगा।
शोध के दौरान विशेषज्ञों की टीम परिवार के सदस्यों के खानपान, दिनचर्या, शारीरिक गतिविधियों, नींद और स्वास्थ्य में होने वाले बदलावों से जुड़ी जानकारियां जुटाएगी। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि एक ही परिवार के लोगों में बीमारियों का जोखिम अलग-अलग क्यों होता है।
लंबे समय तक जुटाए गए आंकड़ों से वैज्ञानिकों को बीमारी के शुरुआती संकेतों और उनके पीछे मौजूद संभावित कारणों को समझने में मदद मिल सकती है।
जेनेटिक्स और जीवनशैली के संबंधों को समझेंगे वैज्ञानिक
किसी व्यक्ति के बीमार होने के पीछे केवल खानपान ही जिम्मेदार नहीं होता। उसके जीन, आसपास का वातावरण और रोजमर्रा की आदतें भी स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं।
AIIMS की इस स्टडी में इन तीनों पहलुओं के बीच संबंधों की जांच की जाएगी। वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश करेंगे कि परिवार के सदस्यों की आनुवंशिक विशेषताएं बीमारी के खतरे को किस तरह प्रभावित करती हैं।
इसके साथ ही काम का दबाव, मानसिक तनाव, नींद की गुणवत्ता, व्यायाम की आदत और शारीरिक गतिविधियों में अंतर जैसे कारकों का भी अध्ययन किया जाएगा। बचपन से जुड़े अनुभव और शुरुआती जीवन का वातावरण भी स्वास्थ्य पर लंबे समय तक असर डाल सकते हैं।
ब्लड टेस्ट और जेनेटिक जांच से जुटाया जाएगा डेटा
शोध में शामिल परिवारों के सदस्यों की स्वास्थ्य स्थिति का आकलन करने के लिए समय-समय पर अलग-अलग मेडिकल जांच की जा सकती हैं। इनमें ब्लड टेस्ट, जेनेटिक सीक्वेंसिंग और अन्य जरूरी स्वास्थ्य परीक्षण शामिल होंगे।
इन जांचों से वैज्ञानिकों को शरीर में मौजूद आनुवंशिक विशेषताओं और बीमारियों के संभावित जोखिमों के बारे में जानकारी मिलेगी।
अध्ययन के दौरान जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर एक विस्तृत स्वास्थ्य डेटा तैयार किया जाएगा। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि भारतीय आबादी में हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, थायराइड, डायबिटीज और मानसिक तनाव जैसी समस्याओं का संबंध किन आनुवंशिक और जीवनशैली से जुड़े कारकों से है।
भविष्य में मरीजों के हिसाब से तैयार हो सकता है इलाज
इस शोध के नतीजे भविष्य में चिकित्सा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। अगर वैज्ञानिक यह समझने में सफल होते हैं कि एक ही परिवार के सदस्यों में बीमारियों का खतरा अलग-अलग क्यों रहता है, तो इलाज और बीमारी से बचाव की रणनीति को अधिक व्यक्तिगत बनाया जा सकेगा।
इसे पर्सनलाइज्ड मेडिसिन कहा जाता है। इस पद्धति में मरीज की आनुवंशिक बनावट, स्वास्थ्य स्थिति और जीवनशैली को ध्यान में रखकर इलाज की योजना तैयार की जाती है।
इससे डॉक्टरों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि किस व्यक्ति को किसी खास बीमारी का जोखिम अधिक है और उसे समय रहते किन सावधानियों की जरूरत है।
बीमारी होने से पहले जोखिम पहचानने में मिलेगी मदद
इस तरह के शोध का एक बड़ा उद्देश्य बीमारियों का इलाज करने के साथ-साथ उनकी रोकथाम के बेहतर तरीके तलाशना भी है। यदि किसी व्यक्ति में किसी बीमारी से जुड़े जोखिम के संकेत पहले ही पहचान लिए जाएं, तो समय रहते खानपान, व्यायाम, नींद और दूसरी आदतों में जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं।
हालांकि, इस अध्ययन के वास्तविक निष्कर्ष सामने आने के बाद ही पता चलेगा कि अलग-अलग बीमारियों के पीछे कौन से कारक कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फिलहाल यह रिसर्च परिवारों में स्वास्थ्य से जुड़ी भिन्नताओं को समझने और भविष्य में अधिक प्रभावी इलाज विकसित करने की दिशा में अहम कदम हो सकती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख स्वास्थ्य और चिकित्सा अनुसंधान से जुड़ी सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी बीमारी की आशंका या इलाज के लिए योग्य डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।




















