अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से चल रही व्यापारिक तनातनी में फिलहाल कुछ नरमी के संकेत मिले हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात के बाद दोनों देशों ने करीब 60 अरब डॉलर के गैर-संवेदनशील सामानों पर टैरिफ में राहत देने की दिशा में सहमति बनाई है। दोनों देश लगभग 30-30 अरब डॉलर के सामानों के लिए कम शुल्क की व्यवस्था पर आगे बढ़ेंगे।
इसके साथ ही दोनों देशों ने मौजूदा व्यापारिक ट्रूस को दो महीने और बढ़ाकर 10 जनवरी 2027 तक जारी रखने का फैसला किया है। हालांकि, यह समझौता अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को पूरी तरह खत्म नहीं करता है। रणनीतिक और तकनीकी क्षेत्रों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी बने हुए हैं।
किन सामानों पर मिलेगी टैरिफ में राहत?
नई व्यवस्था में अमेरिका से चीन जाने वाले कई कृषि और अन्य गैर-संवेदनशील उत्पादों को शामिल किया गया है। इनमें कृषि उत्पाद, मछली और समुद्री खाद्य पदार्थ, लकड़ी से जुड़े उत्पाद, कॉस्मेटिक्स और मेडिकल उपकरण जैसी श्रेणियां शामिल हैं।
दूसरी ओर, अमेरिका चीन से आने वाले कुछ छोटे घरेलू उपकरणों, खिलौनों, टेबलवेयर, सजावटी सामान और बच्चों से जुड़े उत्पादों पर शुल्क में राहत देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। दोनों देशों ने इन उत्पादों की विस्तृत सूचियां भी जारी की हैं।
हालांकि सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक व्हीकल जैसे कई रणनीतिक क्षेत्र इस सीमित टैरिफ राहत के दायरे में नहीं हैं। इसलिए इसे व्यापक व्यापार समझौते के बजाय सीमित दायरे वाली राहत के रूप में देखा जा रहा है।
चीन खरीदेगा अमेरिकी कोयला
समझौते के तहत चीन ने 2027 और 2028 में हर साल अमेरिका से 1 करोड़ मीट्रिक टन कोयला खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है। दोनों देशों के बीच वित्तीय सेवाओं, निवेश और बाजार पहुंच से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत जारी रखने की सहमति बनी है।
इसके अलावा, अमेरिका और चीन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े जोखिमों और आपात स्थितियों के लिए संवाद का नया माध्यम बनाने तथा दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों को बढ़ाने जैसे कदमों पर भी सहमति जताई है।
क्या खत्म हो गया US-चीन ट्रेड वॉर?
ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी। दोनों देशों ने टैरिफ बढ़ाने की रफ्तार को रोकने और कुछ सामानों पर शुल्क कम करने की दिशा में कदम जरूर उठाया है, लेकिन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बरकरार है।
खास तौर पर अत्याधुनिक तकनीक, सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिज और सप्लाई चेन जैसे मुद्दे अभी भी अमेरिका-चीन संबंधों में अहम बने हुए हैं। रेयर अर्थ और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच बातचीत जारी है।
इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को स्थायी समझौते के बजाय दोनों देशों के बीच तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव कम होने का असर भारत पर भी पड़ सकता है। पिछले कुछ समय में कई वैश्विक कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करने के लिए दूसरे देशों में उत्पादन बढ़ाने की रणनीति अपना रही हैं। भारत भी इस बदलाव से संभावित लाभ लेने की कोशिश कर रहा है।
अगर अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक संबंध अपेक्षाकृत स्थिर होते हैं, तो कुछ कंपनियों के लिए चीन से सप्लाई दोबारा बढ़ाना आसान हो सकता है। ऐसे में भारत को मिलने वाले कुछ संभावित ऑर्डर और निवेश पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, यह असर हर क्षेत्र और कंपनी पर समान नहीं होगा।
भारत के लिए कुछ अवसर भी मौजूद
दूसरी तरफ अमेरिका-चीन तनाव में कमी वैश्विक सप्लाई चेन के लिए स्थिरता ला सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय कारोबार में अनिश्चितता कम होने और कुछ कमोडिटी बाजारों में दबाव घटने की संभावना बनती है।
भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अमेरिका-चीन समझौते में कई रणनीतिक और हाई-टेक क्षेत्रों को व्यापक रूप से शामिल नहीं किया गया है। इसका मतलब है कि इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, फार्मास्यूटिकल्स और अन्य क्षेत्रों में कंपनियां चीन के अलावा वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग बेस की तलाश जारी रख सकती हैं।
ऐसे में भारत के सामने चुनौती यह होगी कि वह अपनी उत्पादन क्षमता, लागत, लॉजिस्टिक्स और निर्यात ढांचे को मजबूत करके वैश्विक कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धी विकल्प बना रहे।
भारत को क्यों रखना होगा नजर?
अमेरिका-चीन संबंधों में आई यह नरमी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत के लिए इसका असर मिश्रित हो सकता है। एक तरफ व्यापारिक तनाव कम होने से वैश्विक बाजार में स्थिरता बढ़ सकती है, वहीं दूसरी तरफ चीन के साथ व्यापारिक संबंध सुधरने पर कुछ क्षेत्रों में भारत को मिलने वाला प्रतिस्पर्धात्मक लाभ कम हो सकता है।
इसलिए आने वाले महीनों में भारत के लिए अमेरिका-चीन व्यापार समझौते की वास्तविक क्रियान्वयन प्रक्रिया, टैरिफ में बदलाव और वैश्विक कंपनियों के निवेश फैसलों पर नजर रखना महत्वपूर्ण रहेगा।



















