इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को हुए संसदीय चुनाव के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। चुनाव परिणामों में किसी भी गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों का बहुमत नहीं मिल पाया। इस बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने चुनाव प्रक्रिया में कथित विदेशी हस्तक्षेप का मुद्दा उठाया है। पार्टी की ओर से अरब नेतृत्व वाली पार्टियों पर कतर और तुर्किये से अवैध आर्थिक मदद मिलने के आरोप लगाए गए हैं।
इन आरोपों के सामने आने के बाद इजराइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट ने मामले की जांच शुरू की। बाद में विदेशी खुफिया एजेंसी मोसाद को भी इस पड़ताल में शामिल किया गया। मोसाद की एंट्री के बाद यह विवाद केवल चुनावी आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें विदेशी संपर्कों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की जांच भी अहम हो गई है।
हालांकि, विदेशी फंडिंग और चुनाव में बाहरी हस्तक्षेप से जुड़े आरोप अभी जांच के विषय हैं। इन्हें साबित तथ्य नहीं माना जा सकता। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि मोसाद क्या है, इसकी जिम्मेदारियां क्या हैं और इजराइल के चुनावी विवाद में इसकी भूमिका क्यों महत्वपूर्ण हो गई है।
क्या है मोसाद और कैसे करती है काम?
मोसाद इजराइल की प्रमुख विदेशी खुफिया एजेंसी है। इसकी स्थापना दिसंबर 1949 में हुई थी। इसका मुख्यालय तेल अवीव में है और यह सीधे इजराइल के प्रधानमंत्री के अधीन काम करती है। एजेंसी का प्रमुख उद्देश्य देश के बाहर से मिलने वाले सुरक्षा खतरों की जानकारी जुटाना और इजराइल के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है।
मोसाद का काम दूसरे देशों में खुफिया सूचनाएं एकत्र करना, विदेशी संगठनों और नेटवर्क की गतिविधियों पर नजर रखना तथा जरूरत पड़ने पर गोपनीय अभियान चलाना है। आतंकवाद से जुड़े खतरों की पहचान करना और विदेशों में इजराइल के खिलाफ होने वाली गतिविधियों की जानकारी जुटाना भी इसकी जिम्मेदारियों में शामिल है।
दुनिया की चर्चित खुफिया एजेंसियों में मोसाद का नाम लिया जाता है। इसकी कई गुप्त कार्रवाइयों और अंतरराष्ट्रीय अभियानों की वजह से इसे लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। हालांकि, इसके अधिकांश ऑपरेशन गोपनीय होते हैं, इसलिए एजेंसी की वास्तविक कार्यप्रणाली और क्षमताओं का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं है।
चुनाव की जांच में मोसाद को शामिल करने की जरूरत क्यों पड़ी?
आमतौर पर किसी देश के अंदर होने वाली सुरक्षा संबंधी घटनाओं और चुनावी अनियमितताओं की जांच वहां की घरेलू सुरक्षा एजेंसियां करती हैं। इजराइल में यह जिम्मेदारी मुख्य रूप से शिन बेट और पुलिस के पास होती है। शिन बेट देश के भीतर आतंकवाद, जासूसी और सुरक्षा से जुड़े मामलों पर काम करती है, जबकि मोसाद का दायरा मुख्य रूप से विदेशों में खुफिया जानकारी जुटाने का है।
इस मामले में विदेशी देशों से कथित संपर्क और आर्थिक मदद के आरोप लगाए गए हैं। इसी वजह से जांच का एक हिस्सा इजराइल की सीमाओं के बाहर तक पहुंच सकता है। ऐसे मामलों में मोसाद की विशेषज्ञता और अंतरराष्ट्रीय खुफिया नेटवर्क की मदद ली जा सकती है।
मोसाद की भागीदारी के पीछे तीन अहम पहलू बताए जा रहे हैं।
विदेशी सरकारों और संगठनों से जुड़े संपर्कों की जांच
लिकुड की ओर से लगाए गए आरोपों में कतर और तुर्किये का नाम आया है। जांच एजेंसियों के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि कथित आर्थिक मदद के पीछे किसी विदेशी सरकार की भूमिका थी या फिर निजी व्यक्तियों और संगठनों ने अपने स्तर पर ऐसा किया। मोसाद विदेशी संपर्कों और दूसरे देशों में सक्रिय नेटवर्क के बारे में जानकारी जुटाने में सहायता कर सकती है।
विदेश से आने वाले धन के स्रोत का पता लगाना
यदि किसी राजनीतिक गतिविधि में विदेश से अवैध धन पहुंचने का संदेह है, तो उसके स्रोत और लेनदेन की कड़ियों को समझना जरूरी होता है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क, कंपनियों और संदिग्ध संपर्कों की पड़ताल करनी पड़ सकती है। विदेशी स्तर पर जानकारी जुटाने के अनुभव के कारण मोसाद की भूमिका अहम हो सकती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की पड़ताल
किसी दूसरे देश की ओर से चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश का आरोप गंभीर माना जाता है। यदि जांच में विदेशी सरकारों या उनके नेटवर्क की संलिप्तता के संकेत मिलते हैं, तो मामला केवल राजनीतिक विवाद नहीं रह जाता। ऐसे में इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी देखा जा सकता है।
आरोपों की जांच में अब तक क्या जानकारी सामने आई?
चुनाव के बाद लिकुड ने आरोप लगाया कि विदेशी आर्थिक मदद के जरिए अरब मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की गई। पार्टी ने इसे चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास बताया। इसके बाद केंद्रीय चुनाव समिति के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नोआम सोलबर्ग ने शिन बेट को मामले की जांच करने के निर्देश दिए।
जांच में कतर के साथ तुर्किये की संभावित भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है। हालांकि, अभी तक सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई निर्णायक सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि इन देशों की सरकारों ने इजराइल के चुनाव को प्रभावित करने के लिए धन उपलब्ध कराया था। दोनों देशों ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज किया है।
इस पूरे विवाद में कुछ अन्य घटनाक्रम भी महत्वपूर्ण हैं।
चुनाव में बड़े स्तर पर धांधली के दावों पर सवाल
इजराइल के चुनाव अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मतदान केंद्रों पर व्यवस्थित रूप से गड़बड़ी होने के आरोपों की पुष्टि करने वाला कोई आधार सामने नहीं आया है। अधिकारियों के मुताबिक, विदेशी हस्तक्षेप की आशंका की जांच अलग विषय है और इसका मतलब यह नहीं है कि मतदान की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हुई थी।
रा’म पार्टी के कार्यकर्ताओं से जुड़ा मामला
चुनाव के दिन रा’म पार्टी से जुड़े तीन कार्यकर्ताओं को कथित मतदाता रिश्वत मामले में हिरासत में लिया गया था। हालांकि, शुरुआती जांच में उनके खिलाफ रिश्वत देने की योजना से जुड़े ठोस सबूत नहीं मिलने की खबरें सामने आईं। यह भी स्पष्ट किया गया कि इन गिरफ्तारियों का विदेशी हस्तक्षेप की व्यापक जांच से सीधा संबंध नहीं है।
विपक्ष ने उठाए जांच के इस्तेमाल पर सवाल
विपक्षी नेता गादी आइजनकोट ने नेतन्याहू और लिकुड पर चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता को लेकर संदेह पैदा करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि विदेशी हस्तक्षेप से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन उनका इस्तेमाल चुनाव परिणामों को प्रभावित करने या नई संसद के गठन में देरी करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
चुनाव परिणामों का गणित क्या कहता है?
इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें होती हैं और सरकार बनाने के लिए किसी दल या गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना जरूरी है।
27 अक्टूबर को हुए चुनाव के बाद सामने आए नतीजों के अनुसार, नेतन्याहू के समर्थन वाले गठबंधन को 53 सीटें मिलीं, जबकि उनके विरोधी दलों को 48 सीटें हासिल हुईं। वहीं, अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने कुल 19 सीटें जीतीं। इस तरह किसी भी बड़े राजनीतिक गुट को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला।
| राजनीतिक समूह | हासिल सीटें |
|---|---|
| नेतन्याहू समर्थक गठबंधन | 53 |
| विपक्षी गठबंधन | 48 |
| अरब नेतृत्व वाली पार्टियां | 19 |
| कुल | 120 |
अरब नेतृत्व वाली पार्टियों की सीटें इस बार राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गई हैं। विपक्षी गठबंधन को सरकार बनाने के लिए इनके समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। यही वजह है कि चुनाव के बाद इन दलों की भूमिका को लेकर इजराइल की राजनीति में बहस तेज हो गई है।
क्या मोसाद की जांच से चुनाव के नतीजों पर पड़ेगा असर?
मोसाद के जांच में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि इजराइल के चुनाव परिणाम बदल जाएंगे। चुनाव समिति ने साफ किया है कि विदेशी हस्तक्षेप से जुड़ी जांच का अंतिम चुनाव परिणामों पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या चुनाव के दौरान किसी विदेशी पक्ष ने गैरकानूनी तरीके से मतदाताओं को प्रभावित करने या आर्थिक मदद पहुंचाने की कोशिश की थी।
अधिकारियों के अनुसार, जांच पूरी होने के बाद संबंधित जानकारी चुनाव समिति के अध्यक्ष को सौंपी जाएगी। इसके आधार पर आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जा सकता है। वहीं, चुनाव परिणामों को राष्ट्रपति को सौंपने की निर्धारित प्रक्रिया भी जारी रहेगी।
इजराइल की राजनीति में आगे क्या हो सकता है?
चुनाव में बहुमत नहीं मिलने के कारण नेतन्याहू के सामने सरकार बनाने की चुनौती बनी हुई है। दूसरी ओर, विपक्षी दल भी अन्य पार्टियों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर सकते हैं। अरब नेतृत्व वाली पार्टियों की सीटें इस राजनीतिक समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
ऐसे माहौल में विदेशी हस्तक्षेप की जांच का राजनीतिक प्रभाव भी दिखाई दे सकता है। एक तरफ लिकुड इसे चुनाव की निष्पक्षता से जुड़ा गंभीर मामला बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष का कहना है कि बिना ठोस सबूत किसी समुदाय या राजनीतिक दल पर आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए।
फिलहाल, मोसाद और शिन बेट की जांच से यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि विदेशी नेटवर्क या किसी बाहरी पक्ष की चुनाव में कोई भूमिका थी या नहीं। जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो पाएगी। तब तक इसे विदेशी हस्तक्षेप का साबित मामला मानने के बजाय एक जारी जांच के रूप में देखना उचित होगा।



















