खटाखट का अर्थ होता है -जल्दी, अतिशीघ्र। शीघ्रता से काम करना अच्छी बात है लेकिन अतिशीघ्रता बहुधा दुख देती है। नीति भी कहती है कि अति सर्वत्र बर्जयेत। सत्ता के करीब पहुंचने की व्यग्रता तो फिर भी ठीक है लेकिन इसके लिए निर्धारित मानकों की अवहेलना किसी भी लिहाज से तर्क संगत और स्वीकार्य नहीं है। सत्ताधीय सुगमता से जनता की सेवा कर पाता है, इसके विपरीत आम जन को जनसेवा करने में काफी मशक्कतों से दो-चार होना पड़ता है। अपने देश में एक कहावत अक्सर लोगों की जुबान पर आ जाती है। काम सही इत्मीनान का, जल्दी का काम शैतान का। काम तो सोच विचार कर योजना बनाकरही करनाचाहिए,वर्ना उसकी पूर्णता में संदेह बनारहता है। सौ अश्वमेध यज्ञ कर इंद्र पद हासिल करने भर से महाराज नहुष को संतोष नहीं हुआ, वह देवराज इंद्र की पत्नी शची से मिलने को बेताब हो उठे और सप्तऋषियों के कंधे पर पालकी में सवार होकर शची के भवन की ओर जाने लगे। इस क्रम में कई बार उन्होंने सर्प:सर्प: कहा। उनकी इस जल्दबाजी और उतावलेपन से नाराज सप्त ऋषियों ने उन्हें अजगर होने का श्राप दे दिया। भारतीय राजनीति में भी खटाखट शब्द का कुछ ऐसा ही प्रयोग हो रहा है। सत्ता पाने की जल्दबाजी में विपक्ष के नेता इस शब्द को घलुआ बनाए हुए हैं। महिलाओं को पैसा देंगे खटाखट। गरीबी दूर करेंगे खटाखट। नौकरी देंगे खटाखट। किसी भी समस्या का समाधान करेंगे खटाखट। अब उन्हें कौन समझाए कि जीवन में कुछ भी खटाखट, फटाफट नहीं होता। किसी कार्य के शुरू होन ेमें जितना विलंब होता है, उसके संपादित होने में भी उतना ही समय लगता है। अलादीन के चिराग वाली एक कहानी सुनी थी, उसे जलाते ही जिन्न प्रकट होता था और चिराग जलाने वाले के काम चुटकियों में हल कर देता था । कुछ कहानियों में बोतल का ढक्कन खोलते ही उससे प्रेत निकलता था और बोतल खोलने वाले के काम चुटकी बजाते ही पूरे कर देता था। इन कहानियों में कितना सच है और कितना फसाना, इसे तो कहानीकार ही बेहतर बता सकते हैं लेकिन लगता है कि कुछ राजनीतिक लोगों के रथ भी भूत हांक रहे हैं। चुटकियों में देश की जटिल समस्याओं के समाधान के जिस तरह दावे किए जा रहे हैं, इससे तो कुछ ऐसे ही संदेश मिलते हैं। एक बड़ी पार्टी के नेता के गरीबी और बेरोजगारी का हल खटाखट निकालने के दावे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी जनसभाओं में जमकर चुटकी ली है और कहा है कि 4 जून को जब लोकसभा के चुनाव नतीजे आएंगे तो इंडी गठबंधन खटाखट बिखर जाएगा। कभी अमेठी से गए थे और अब रायबरेली से भी खटाखट चले जाएंगे। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी का भी बायन अपने पास रखते नहीं हैं। विरोधी दल का उधार तो वे सूद सहित वापस लौटा देते हैं। जो दल पहले से ही रेशे-रेशे में जुड़े हैं, उनके बिखरने के लिए तो एक झटका ही काफी है। धबका लागा फूटि गा कछु न आया हाथ। चुनाव के दौरान में हर नेता अपनी दलगत उपलब्धियां गिनाता है। वह देश के लिए क्या करेगा, यह बताता है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। सबके बताने के तौर-तरीके अलग हो सकते हैं। देश चलाना निश्चित रूप से कठिन काम है और जिस देश में इतनी विविधताएं हों, उसे चलाना तो वाकई मुश्किल है। संपन्न घरों में जन्मे लोग देश चलाएंगे या गरीब लोग, यह जनता तय करेगी। उसे ही करने दें,यही उचित भी है। हालांकि राजनीति में गरीब और अमीर का विभेद बहुत पहले ही खत्म हो चुका है। ज्यादातर प्रत्याशी करोड़पति ही हैं। जाके पैर न फटी बेवाई। सो क्या जानै पीर पराई। करोड़पतियों के हवाले गरीब और निचले तबके के लोगों की चिंता है। जैसे काजल की कोठरी में गया हुआ व्यक्ति झक्कास सफेद नहीं लौटता, वैसे ही राजनीति की बैतरणी में स्नान करने वाला गरीब नहीं रह जाता। राजनीति अजस्त्र उपकारों से नवाजती है। इस दर पर कोई भी सवाली खाली आ तो सकता है, मगर यहां से खाली हाथ नहीं जाता। यहां अपनोंकाभला चाहने वालेतो बहुतेरे हैं लेकिन सबको अपना परिवार मानने वाले विरले हैं। जनता पहचानती है, सबको, वह इस चुनाव में बहुत हद तक पहचान भी लेगी लेकिन भरमाने और भटकाने वालों से बचे तब न। सत्ता में कौन रहेगा, कौन नहीं, यह सोचते वक्त जनता को इतना विचार तो करना ही होगा कि वह संप्रभु रहेगी या नहीं और रहेगी भी तो कितने प्रतिशत। बिखरी हुई राजनीतिक जमात जुड़ जाएगी या फिर बिखर जाएगी, यह सवाल उतना बड़ा नहीं, जितना यह कि सरकार बनाने वाली जनता अपने वजूद को किस हद तक बचा पाएगी?

















