-रवि तिवारी
श्रीराम कार्तिक अमावस्या के दिन अपने राज्य कौशल वापिस लौट रहे थे। तुलसीदास कृत रामचरितमानस के अनुसार, रावण वध के पश्चात जब श्रीराम की अयोध्या वापसी की बेला आई तो धर्म-अधर्म के इस युद्ध मे उनके साथी रहे नील, जामवंत, हनुमान, सुग्रीव आदि दुःखी हो गए। अपने साथियों की मन:स्थिति को भांपते हुए श्रीराम ने उन्हें भी अपने साथ चलने के लिये कहा।
कुबेर का पुष्पक विमान उन्हें वायु मार्ग से अयोध्या ले जा रहा था। किंतु श्रीराम मार्ग में कई स्थानों पर अपने मित्रों के यहां रूके। सबसे पहले विमान अगस्त्य ऋषि के आश्रम में पहुँचा। मुनि अगस्त्य का आश्रम दंडकवन में था। इस आश्रम में उनके साथ कई अन्य मुनि भी रहते थे। तुलसीदास जी इस संदर्भ में लंकाकाण्ड में लिखते है-
“तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा।।
कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब कें अस्थाना।।”
अब वो प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम के समीप पहुँच जाते है। यहाँ से वो गंगा माँ को प्रणाम करते है और सीता जी को संगम का महात्म्य समझाते है। इस बीच उन्हें अपनी राजधानी अयोध्या के दर्शन भी होते है-
“पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि।”
अब उनका पुष्पक विमान प्रयागराज में पड़ाव डालता है। यहाँ पर त्रिवेणी में स्नान करने के उपरांत वो वानरों और ब्राह्मणों को भोज भी कराते है-
“पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह।कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह।”
यहाँ से भगवान श्रीराम ने अपने आगमन की प्रथम सूचना अयोध्या संप्रेषित की-
“जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती॥रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥”
इसी दौरान श्रीराम ने भरत को अपने आगमन की सूचना हेतु हनुमान को आदेश दिया कि ब्राह्मण का रूप धारण कर के नंदीग्राम जाओ-
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥
सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा॥
इसके उपरांत श्रीराम भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुँचते है। यहाँ से पुष्पक विमान गंगा के दूसरे छोर पे पड़ाव डालने हेतु उड़ान भरता है। यहाँ पर श्रीराम अपने प्रिय मित्र निषाद राज से मिलते है। सीता, गंगा की पूजा-अर्चना करती हैं और आशीर्वाद ग्रहण करती हैं अब विमान अयोध्या के लिये उड़ान भरता है।
श्रीराम के अयोध्या आगमन की खुशी में समस्त अयोध्या की स्त्रियाँ दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मंगल के मूल नवीन तुलसीदल आदि वस्तुएँ सोने की थालों में भर-भरकर मंगल गीत गाते हुए अयोध्या भर में घूम रही है। श्रीराम को आते देखकर समस्त अयोध्या नगरी सौंदर्य की खान हो गई है। सरयू जल अति निर्मल हो गया है।
अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी॥
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा । भइ सरजू अति निर्मल नीरा
अयोध्या का प्रत्येक नागरिक श्रीराम की एक झलक पाने को व्याकुल है। जो जिस दशा में है, वो उसी दशा में बाहर दौड़ा चला आ रहा है। कहीं श्रीराम की पहली छवि निहारने से कोई वंचित न रह जाए। समस्त लोग श्रीराम के दर्शन के लिये अयोध्या में अपने घरों से बाहर आते है। जिसपर तुलसीदास जी लिखते हैं –
सुनि अयोध्या पुलकित सब नारी। हरष बिभोर भए नर नारी॥
द्वार द्वार गृह गृह सब लोगा। बारहि बारहि करहिं बिनोगा॥
और अंततः श्रीराम का पुष्पक विमान अब अयोध्या में उतर चुका है।
आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान।
नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान ॥
आप सभी को इस दीपावली के शुभ अवसर पर ढेरों शुभकामनाएं एवं अत्यंत प्रेम,
प्रभु श्री राम की जय हो धर्म की विजय हो।।
















