भारत में बच्चों में कैंसर के मामलों को लेकर एक अध्ययन में कई अहम जानकारियां सामने आई हैं। इसमें देश के अलग-अलग राज्यों में कैंसर से पीड़ित बच्चों के दर्ज मामलों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में ऐसे बच्चों की संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई है। इसके बाद दिल्ली और तमिलनाडु का स्थान है। शोध में 22 हजार से अधिक बच्चों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।
इस अध्ययन में एम्स दिल्ली समेत कई प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल रहे। इसमें केवल मरीजों की संख्या ही नहीं, बल्कि बच्चों के इलाज के लिए उपलब्ध सुविधाओं और परिवारों को अस्पताल तक पहुंचने में होने वाली परेशानियों पर भी ध्यान दिया गया है।
उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा दर्ज हुए मामले
अध्ययन में शामिल आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में बच्चों के कैंसर के सबसे अधिक 5,057 मामले दर्ज किए गए। यह विश्लेषण में शामिल कुल मामलों का करीब 22.6 प्रतिशत है। इस सूची में दिल्ली दूसरे स्थान पर है, जहां कुल मामलों में 19.2 प्रतिशत हिस्सेदारी दर्ज की गई।
तमिलनाडु तीसरे स्थान पर रहा। यहां 4,010 मामले सामने आए, जो कुल आंकड़ों का लगभग 18 प्रतिशत है। वहीं, आंध्र प्रदेश में 1,354 मामले दर्ज किए गए। यह कुल मामलों का करीब 6.1 प्रतिशत है।
बच्चों में कैंसर के दर्ज मामलों वाले प्रमुख राज्य
अध्ययन में उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर प्रमुख राज्यों की स्थिति इस प्रकार है:
- उत्तर प्रदेश: 5,057 मामले, कुल का 22.6 प्रतिशत
- दिल्ली: कुल मामलों का 19.2 प्रतिशत
- तमिलनाडु: 4,010 मामले, कुल का 18 प्रतिशत
- आंध्र प्रदेश: 1,354 मामले, कुल का 6.1 प्रतिशत
इसके अलावा पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और बिहार में भी बच्चों में कैंसर के मामले दर्ज किए गए हैं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में इन राज्यों की सटीक संख्या और आपसी क्रम का विवरण नहीं दिया गया है।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि ये आंकड़े अध्ययन में शामिल मरीजों के दर्ज मामलों पर आधारित हैं। इनसे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किस राज्य में प्रति लाख बच्चों पर कैंसर का जोखिम सबसे अधिक है। इसके लिए राज्यों की बाल आबादी और बीमारी की दर से जुड़े अलग आंकड़ों की जरूरत होती है।
इलाज के लिए परिवारों को तय करनी पड़ती है लंबी दूरी
अध्ययन में बच्चों के कैंसर के इलाज से जुड़ी एक बड़ी चुनौती भी सामने आई है। देश में बाल कैंसर के विशेषज्ञ अस्पताल और उपचार केंद्र सभी क्षेत्रों में समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इसका सबसे ज्यादा असर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले परिवारों पर पड़ता है।
कई परिवारों को बच्चों के इलाज, कीमोथेरेपी और नियमित जांच के लिए बड़े शहरों तक जाना पड़ता है। अध्ययन के मुताबिक, 60 प्रतिशत से अधिक परिवारों को इलाज या नियमित जांच के लिए दो घंटे से ज्यादा का सफर करना पड़ता है।
इस लंबी दूरी के कारण परिवारों पर यात्रा और रहने का खर्च बढ़ जाता है। इसके अलावा बार-बार अस्पताल पहुंचने में समय और आर्थिक संसाधन भी खर्च होते हैं।
सॉलिड ट्यूमर के इलाज में बढ़ सकती है परेशानी
बच्चों में कैंसर के अलग-अलग प्रकार होते हैं और हर बीमारी का इलाज एक जैसा नहीं होता। अध्ययन में बताया गया है कि ब्लड कैंसर के मुकाबले सॉलिड ट्यूमर से पीड़ित बच्चों को कई बार सर्जरी और रेडियोथेरेपी जैसी सुविधाओं के लिए अधिक दूरी तय करनी पड़ती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इलाज की सुविधाओं तक समय पर पहुंच नहीं होना मरीजों और उनके परिवारों के लिए बड़ी समस्या बन सकता है। आर्थिक परेशानियों के चलते कुछ परिवारों के लिए लंबे समय तक उपचार जारी रखना भी मुश्किल हो जाता है।
विशेषज्ञों ने बाल कैंसर उपचार केंद्र बढ़ाने की दी सलाह
शोध में शामिल एम्स दिल्ली, एम्स कल्याणी और चेन्नई कैंसर इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों ने बाल कैंसर के इलाज की सुविधाओं को बेहतर बनाने पर जोर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर के इलाज की सुविधा केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। क्षेत्रीय स्तर पर भी ऐसे अस्पताल और उपचार केंद्र विकसित किए जाने चाहिए, जहां बच्चों को जरूरी चिकित्सा सेवाएं मिल सकें।
इसके साथ ही शुरुआती लक्षणों की पहचान करने और मरीजों को सही समय पर विशेषज्ञ अस्पतालों तक पहुंचाने वाली रेफरल व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत बताई गई है।
समय पर पहचान और इलाज से बचाई जा सकती है बच्चों की जान
बच्चों में कैंसर की पहचान जितनी जल्दी होती है, इलाज की योजना बनाना उतना ही आसान हो सकता है। लगातार बुखार, असामान्य गांठ, बिना स्पष्ट कारण वजन कम होना, शरीर में असामान्य दर्द या लगातार कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि, इन लक्षणों का मतलब हमेशा कैंसर होना नहीं है।
यदि किसी बच्चे में लंबे समय तक ऐसे लक्षण बने रहते हैं तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। समय पर जांच, सही निदान और विशेषज्ञों की देखरेख में उपचार से बेहतर परिणाम पाने में मदद मिल सकती है।



















