संसदीय चुनाव के तीसरे चरण का मतदान समाप्त हो गया और इसी के साथ अगले चरण के मतदान पर सभी राजनीतिक दलों ने अपना ध्यान केंद्रित कर दिया। आरोपों-प्रत्यारोपों के दिव्यास्त्र राजनीतिक शूरमाओं को जहां अंदर तक हिला रहे हैं, वहीं राम राज्य और वोट जिहाद की जंग भी अपने चरम पर है। भाजपा का तर्क है कि विपक्षी दल सनातन संस्कृति की मुखालफत कर रहे हैं। एक वर्ग विशेष का तुष्टीकरण हो रहा है। इंडिया गठबंधन की जमात एक खास वर्ग को आरक्षण देने का राग अलाप रही है तो राजग से जुड़े दल नहीं चाहते कि धर्म के आधार पर आरक्षण दिया जाए। विपक्ष चाहता है कि जातिगत आधार पर सर्वेक्षण हो, आर्थिक सर्वेक्षण हो जिससे यह पता चल सके कि किसके पास कितना धन है और फिर उसे लेकर उसका बंटवारा किया जा सके। भ्रष्टाचार के मुददे पर भी एक दूसरे को घेरने के प्रयास हो रहे हैं लेकिन झारखंड के एक मंत्री के निजी सचिव के नौकर के यहां पड़े छापे में 35 करोड़ की रकम जब्त हुई है, उससे इतना तो साफ है कि इस देश में कुछ लोगों ने नोटों के गोदाम सजा रखे हैं और कुछ लोगों के पास दो वक्त की सम्मानजनक रोटी जुटाने का भी व्यवस्थित जुगाड़ नहीं है। क्या सर्वे में इस तरह की जमाखोरी का खुलासा हो पाएगा। जो राजनीतिक दल देश के आर्थिक सर्वे की बातकर रहे हैं, पहले तो ईमानदारी के साथ उन्हें अपनी संपत्ति का खुलासा करना चाहिए। सांसदों और विधायकों ने नामांकन पत्र जारी करते हुए जो अपनी जमा-पूंजी बताई है, प्रथम तो उसकी जांच होनी चाहिए। इस बात का सत्यापन किया जाना चाहिए कि जिन्हें इस देश की जनता अपना प्रतिनिधि चुनेगी, वह उसके विश्वास के धरातल पर खड़ा होने के काबिल हैं भी या नहीं? कुछ ऐसा ही नौकरशाहों के मामले में भी होना चाहिए। उन्हें भी अपनी संपत्ति का ब्यौरा देश के सामने रखना चाहिए और बताना चाहिए कि उन्होंने इतनी अकूत दौलत कैसे बनाई। अधिकारियों और नेताओं की संपत्ति का ही सर्वेक्षण हो जाए तो भी इस देश का भला हो जाए। न्यायपालिका से जुड़े लोग भी अगर उदारतापूर्वक इस अभियान का हिस्सा बनें और स्वत: अपनी संपत्ति का ब्यौरा दे दें तो भी विकसित भारत के निर्माण का लक्ष्य एक झटके में पूरा हो सकता है। इसके लिए इस देश की जनता को वर्ष 2047 तक अनावश्यक इंतजार का सामना नहीं करना पड़ेगा। हर औद्योगिक संस्थान के पास मानव कल्याण का एक कोष होता है, अगर उसे वह ईमानदारी के साथ खर्च कर दे तो भी इस देश की एक बहुत बड़ी जरूरतमंद आबादी का भला हो सकता है। धर्मस्थल भी इस दायित्व को बखूबी निभा सकते हैं। पहले कभी इस देश के मंदिर धार्मिक सांस्कृतिक, आर्थिक और वैचारिक जागृति के केंद्र हुआ करते थे, देश के चिंतन-चरित्र, शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता करते थे। इस देश में में जितने धर्मस्थल हैं, अगर वे ही ठान लें तो इस देश का भला होते देर न लगेगी। राजनीतिक दलों को अपनी संपत्ति सार्वजनिक करने और जितनी जरूरी है, उतनी अपने पास रखकर शेष देश को सौंपने की पहल करनी चाहिए। इससे अच्छी पहल दूसरी नहीं हो सकती।

















