भ्रष्टाचार के मामले में राजनीतिक पार्टियां कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी और वैश्विक स्तर पर भी। यह अपनी राय बिल्कुल भी नहीं है। लोकसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा एक दूसरे पर लगाए गए आरोप तो कुछ ऐसा ही प्रमाणित करते हैं। एक दल को तो ब्रह्मांड की सबसे झूठी और भ्रष्टाचारी पार्टी कहा गया है। जमानत पर जेल से बाहर आए एक नेता की भी राय यही है, वे संबंधित दल को दुनिया की सबसे भ्रष्ट पार्टी करार देने में जरा भी नहीं सकुचाए। आलोचना करना वैसे भी बहुत सरल होता है। कमियां देखना और गिनाना बहुधा आसान होता है लेकिन किसी की प्रशंसा करना बहुत कठिन होता है। जब किसी से यह कहा जाता है कि वह अपनी कुछ खामियां और अच्छाइयां गिनाए तो जीभ उलझने लगती है। गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को एक सबसे बुरा और दुर्योधन को एक सबसे अच्छा आदमी तलाशने के लिए एक माह का समय दिया लेकिन दोनों ही गुरु प्रदत्त दायित्व को निभाने में विफल रहे। दोनों के तर्क भी बहुत अजीब थे। युधिष्ठिर ने कहा कि उसे एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला जिसमें कोई अच्छाई न हो और दुर्योधन ने कहा कि उसे एक भी ऐसा आदमी नहीं मिला जिसमें कोई बुराई न हो। आचार्य सुश्रुत के गुरु ने कहा था कि वह एक ऐसा बेकार पौधा लेकर आए, जिसमें कोई औषधीय गुण न हो। सुश्रुत वर्षों की छानबीन के पास जब अपने गुरु के पास पहुंचे तो उनके हाथ खाली थे और सिर झुका हुआ था। उन्होंने बहुत विनम्रता से कहा कि गुरुदेव उन्हें अब तक एक भी ऐसा पौधा नहीं मिला जो औषधीय गुणों से रहित हो। जब हम किसी की आलोचना करते हैं तो एक तरह से हम अपनी वैचारिक दरिद्रता का ही परिचय दे रहे होते हैं। जिसकी जैसी भावना होती है, वह संसार को उसी तरह से देखता है। राजनीतिक दलों पर भी कमोवेश यही बात लागू होती है। कौन कैसा है, यह बताने की बजाए राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने बारे में सोचना चाहिए कि वे कैसे हैं? कौन पस्त है, कौन त्रस्त है और कौन मस्त है, इस पर विचार करने से अच्छा तो यही होगा कि वे अपनी स्वाभाविक मस्ती की राह की बाधाओं को हटाने का प्रयास करते और जनता के हितों की चिंता करते। राजनीतिक दल देश के लिए कितने फायदेमंद हैं, उन्होंने कितने जरूरतमंदों के आंसू पोछे हैं, चिंतन तो इस पर होना चाहिए था। एक ओर विकसित भारत की अवधारणा और संकल्पों के साथ आम चुनाव लड़ा जा रहा है और दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की घातक बयानबाजी से दुनिया में भारत की छवि खराब हो रही है। जब अपनी दही को हम ही खट्टी करार देंगे तो दुनिया के देशों से यह उम्मीद क्यों करें कि वे उसकी प्रशंसा करेंगे। भारत की वर्षों की गुलामी की वजह ही यही थी कि एक राजा ने दूसरे राजा को न तो सम्मान दिया और न ही उसकी सीमाओं और संप्रभुता की रक्षा की। आरोपों से ही देश विकसित नहीं होता। देश आगे बढ़े, इस निमित्त खुद बढ़ें और दूसरों को भी आगे बढ़ाएं। सेवा के लिए सत्ता ही जरूरी नहीं, जो जहां हैं, वहीं से जनसेवा करे। रोका किसने है?

















