देश कई तरह के तूफानों की जद में है। इसमें प्राकृतिक तूफान भी शामिल है और राजनीतिक भी। आसमान अंगारे बरसा रहा है। बढ़ते तापमान से लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। इन सबके बीच राजनीतिक दलों की चुनावी सभाएं और रोड शो कुछ अलग तरह की मानसिक सरगर्मी बढ़ा रहे हैं। अंतिम चरण का मतदान होना है और फाइनल नतीजे चार जून को आने हैं लेकिन उसके नतीजे अभी से बताने वाले नेताओं की बाढ़ आ गई है। जीत-हार के सबके अपने दावे हैं। कौन सत्ता शीर्ष पर पहुंचेगा और कौन राजनीति के नेपथ्य में जाएगा, यह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन तय करेगी। इस देश की जनता तय करेगी लेकिन जनता को गुमराह करने और ईवीएम को बदनाम करने के समवेत प्रयास पूरी मुस्तैदी से हो रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों ने भी अपने-अपने तरीके से चुनाव परिणाम के भाष्य करने शुरू कर दिए हैं। मतदाताओं के दिल में क्या है, इसका अंदाज उन्होंने पहले ही कर लिया है। जिस तरह चुनावी अटकलों की खेती हो रही है, उससे किसको कितना लाभ होगा, यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन मतदाताओं का भ्रमित होना बहुद हद तक संभव है। कल तक जो विश्लेषक भाजपा का धुर विरोध कर रहे थे, उन्हें भी अब भाजपा चुनावी बढ़त लेती और सरकार बनाती नजर आने लगी है। कुछ लोग बेहद आशान्वित हैं कि सरकार तो विपक्ष की ही बनेगी और इसके पक्ष में उनके पास अनेक तर्क है। अब तो ज्योतिषियों ने भी इस मुद्दे पर संभावनाएं जताना शुरू कर दिया है लेकिन निश्चित तौर पर कोई भी कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है। कुछ चगड़ किस्म के नेता तो फूट डालने का प्रयोग भी कर चुके हैं। वे अमित शाह को प्रधानमंत्री और योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से हटाए जानेका आसार व्यक्त कर चुके हैं। राहत इंदौरी की एक गजल है कि ‘जो कहीं नहीं होगा, अखबार में आ जाएगा।’ मौजूदा राजनीति पर यह बात अक्षरश: लागू होती नजर आ रही है। चार सौ पार और चार सौ हार के दावों के बीच देश की राजनीति कहां जा रही है, यह विमर्श का विषय है। विपक्ष को लगता है कि भाजपा ने पुराने सांसदों को टिकट देकर शायद गेंद उनके पाले में डाल दी है और उन्हें कई सीटों पर चुनाव को क्षेत्रीयता का अमली जामा पहनाने का मौका मिल गया है। कुछ सांसदों की अलोकप्रियता का लाभ उन्हें मिल सकता है लेकिन भाजपा जिस तरह नरेंद्र मोदी के चेहरे पर वोट मांग रही है, यह विपक्ष की रणनीतिक काट नहीं तो और क्या है? प्रबुद्ध वर्ग की मानें तो भाजपा इस बार कश्मीर से कन्याकुमारी तक बेहतर प्रदर्शन करने जा रही है। दक्षिण के राज्यों में जहां उसकी जीत पर कांग्रेस ताला लगाने के दावे करती रही है, वहां भी भाजपा का इस बार का प्रदर्शन बेहतरीन नजर आ रहा है। संघ परिवार के आंतरिक सर्वे तो कमोवेश इसी ओर इशारे करते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में भी भाजपा को बहुत नुकसान होने नहीं जा रहा है। हालांकि योगी आदित्यनाथ का दावा है कि वह यूपी की सभी 80 सीटों पर विजयध्वज लहराने जा रहे हैं तो कुछ लोग इसे उनका अति आत्मविश्वास करार दे सकते हैं लेकिन विपक्ष को यह नहीं भूलना चाहिए कि यूपी में बसपा का वोट शेयर इतना भी कम नहीं होने जा रहा कि कांग्रेस उसकी बराबरी कर ले। ऐसे में इस गठबंधन से विपक्ष को बहुत लाभ होगा, इसकी उम्मीद कम ही है। मोदी के प्रति लोगों में आक्रोश नहीं है। ऐसे में जीत की बयार किधर बहेगी, आकलन तो किया ही जा सकता है। वैसे भी सपने देखने का अधिकार सभी को है। राजनीतिक दल भी सपने देख रहे हैं। जिस सीबीआई और ईडी को वे राजनीतिक हथियार बता रहे हैं, उन्हें उम्मीद है कि वही सीबीआई और ईडी नरेंद्र मोदी से पूछताछ करती नजर आएगी। इसे बदले की राजनीति कहें या कुंठा का चरमोत्कर्ष,लेकिन दिल की बात जुबान पर कब आ जाती है, पता ही नहीं चलता। प्रबुद्ध लोग तो खत का मजमून भी लिफाफा देखकर भांप लेते हैं। मतदाताओं ने अपना काम कर दिया। कुछ जिलों के मतदाता एक जून को अपना दायित्व निभा देंगे। इसके बाद तेल भी दिखेगा और तेल की धार भी दिखेगी और वह भी पूरी शिद्दत के साथ।

















