लोकतंत्र की सबसे बड़ी जंग चल रही हो तो हर राजनीति दल और उसके नेता का ध्यान चुनाव जीतने पर होता है और इसके लिए वह अपना एक भी क्षण अपने हाथ से गंवाने नहीं देना चाहता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके अपवाद हैं। वे चुनाव के दौरान ध्यान लगाना चाहते हैं। यह जानते हुए भी कि उनके विरोधी दलों का ध्यान उन्हीं पर है। वे उनकी हर गतिविधि पर सतर्क नजर रखे हुए हैं। उनकी हल्की सी गलती का भी इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री ने 30 मई को कन्याकुमारी में ध्यान लगाने की बात की है। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने अनेक अवसरों पर ध्यान लगाया है। द्वारिका में समुद्र की गहराई में भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष वे ध्यान लगा चुके हैं। पूजा-अर्चना कर चुके हैं। केदारनाथ की गुफा में रात भर लगाया गया उनका ध्यान तो पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बना था। ऐसे में ध्यान के लिए उन्होंने अगर कन्याकुमारी को चुना है तो इसके अपने निहितार्थ हैं। यह सच है कि दक्षिण के राज्यों में चुनाव समाप्त हो चुके हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए यह समझना जरा कठिन है कि ध्यान के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कन्याकुमारी को क्यों चुना? कश्मीर से कन्याकुमारी तक के क्षेत्र को बतौर भारत निरूपित किया जाता है। स्वामी विवेकानंद शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में भारतीय ज्ञान पताका फहराने के बाद सर्वप्रथम कन्याकुमारी ही आए थे और यहां की भूमि को साष्टांग प्रणाम किया था। नरेंद्र मोदी भी कन्याकुमारी में ध्यान साधना कर रहे हैं। स्वामी विवेकानंंद का संबंध पश्चिम बंगाल से है और बंगाल और ओडिशा में अंतिम चरण का मतदान अवशेष है। ऐसे में प्रधानमंत्री का यह ध्यान दोनों राज्यों के मतदाताओं पर गहरा असर डाल सकता है। 30 मई की शाम तक वैसे भी चुनाव प्रचार खत्म हो जाना है। प्रधानमंत्री पहले ही अपने संसदीय क्षेत्र को इतना मथ चुके हैं कि अब और मथने की जरूरत नहीं है। रही बात संदेश देने की, तो अपने आचरण, कार्यव्यवहार से नरेंद्र मोदी भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को संदेश देते रहे हैं। ऐसे में उनका यह प्रयोग निष्प्रयोज्य तो बिल्कुल नहीं हो सकता। एक ओर जहां विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सियासी पटखनी देने की हर संभव कोशिश कर रहा है, ऐसे में प्रधानमंत्री की ध्यान साधना उनके समर्थकों के गले बिल्कुल भी नहीं उतरती लेकिन उन्हें अपने नेता पर विश्वास है और प्रधानमंत्री को अपने समर्थकों पर। उन्होंने सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास का जो नारा दिया है, उसे उनकी कथनी और करनी में बखूबी देखा-समझा जा सकता है। उनके प्रतिद्वंद्वी अजय राय वर्ष 2014 और 2019 के चुनाव में मत प्राप्ति के मामले में तीसरे स्थान पर रहे थे। अचानक वे पहले स्थान पर वैसे भी नहीं आ सकते लेकिन भारतीय संस्कृति में प्रतिद्वंद्वी को छोटा समझने और कमतर आंकने की परंपरा नहीं है। भाजपा चुनाव को चुनाव की तरह ही लड़ती है। उसका हर कार्यकर्ता ईमानदारी से चुनाव लड़ता है। इसलिए इस ध्यान साधना से परेशान होने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री की सुचिंतित योजना को समझना विपक्ष के लिए आसान खेल नहीं है। जीत के लिए मस्तिष्क का शीतल होना बहुत जरूरी है। चुनाव तो अपने आप में सहज योग है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बेहतर इसे और कौन जानता है?

















