चुनाव में कौन सा राजनीतिक दल डरा हुआ है और कौन सा दल नहीं डरा है, इसे लेकर देश भर में चिंता का बाजार गर्म है। हालांकि सभी के एक ही दावे हैं। वे डरे नहीं हैं लेकिन जनता को डराने के मामले में कोई किसी से कम नहीं। अमुक सरकार बनी तो दलितों, आदिवासियों की जमीन छीन लेगी और अमुक सरकार बनी तो देश में तालिबान जैसा शासन स्थापित हो जाएगा , जैसी तमाम बातें राजनीतिक मंचों से उछलकर जनता के कर्णकुहरों तक पहुंच रही है। रोड शो और सम्मेलनों के जरिए जनता को यह समझाने के प्रयास हो रहे हैं कि उनका ही दल देश के लिए उपयुक्त है। उसके व्यापक हितों की चिंता करता है। सातवें चरण का चुनाव प्रचार खत्म होने से एकदिन पहले राजनीतिक दलों ने रोड शो कर जिस तरह अपनी ताकत का अहसास कराया, उससे इतना तो तय हो गया है कि चुनावी बयार किस दिशा में बह रही है। मतदाताओं को लुभाने की जद्दोजहद में आरोपों-प्रत्यारोपों की बौछार तेज हो गई है। देश बांटने के आरोप भी अब आम हो गए हैं। पूर्वांचल की जिन सीटों पर मतदान होना है, वहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं की घेराबंदी देखते ही बन रही है। गाजीपुर में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के रोड शो ने इस चुनाव को और अधिक रोचक बना दिया है। विपक्ष जितने मुद्दों पर सरकार को घेरता रहा है, उन मुद्दों पर विपक्ष की कारगुजारियां उजागर कर केंद्रीय गृह मंत्री ने जिस तरह जनता को वस्तुस्थिति से अवगत कराया है और चार जून को क्या होगा, इसका शब्द चित्र भी खींचा है, मोदी सरकार न बनने के विपक्ष के अतिविश्वास पर निशाना भी साधा है। उसका विपक्ष पर असर पड़ना स्वाभाविक है। राज्यवार भाजपा को कितनी सीटें मिलेंगी, इसका भी ब्यौरा दिया है। भगवान जगन्नाथ के रत्न भंडार की चाभी के रहस्यमय ढंग से गायब होने का मामला भी इस चुनाव में प्रमुखता से उठाया गया है। नवीन पटनायक की कथित रूप से गिरते स्वास्थ्य में साजिश की गंध तलाशने की भी बात कही गई है। हालांकि विपक्ष ने भी सरकार को घेरने में कोई कोर-कसर नहीं छेड़ी है और जनता को यह संदेश देने का प्रयास किया है कि मोदी सरकार इस बार नहीं आने वाली लेकिन जिन विश्लेषकों के दावे पर राहुल और अखिलेश इस तरह की डींगें हांक रहे हैं, उन विश्लेषकों ने समय रहते ही पाला बदल लिया है और अब तो अमेरिका, चीन और पाकिस्तान का मीडिया भी यह मानने लगा है कि भारत की राजनीति में कोई खास फर्क नहीं आने जा रहा है। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर जिस तरह 72 घंटे के लिए भारत-नेपाल सीमा सील की जा रही है। हर चुनाव में सील की जाती रही है, उससे इतना तो साफ है कि सरकार चुनाव प्रक्रिया में बाहरी हस्तक्षेप को पूरी तरह रोकने की चाक-चौबंद व्यवस्था बनाए हुए है। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर महराजगंज, बहराइच जिले में भारत-नेपाल सीमा पर दोनों देशों की संयुक्त सेना तैनात की जा रही है। तलाशी अवरोधक लगाए जा रहे हैं और गहन तलाशी ली जा रही है, उसका सीधा सा मतलब यही है कि सरकार इस चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रही है। सीसीटीवी और ड्रोन कैमरों के जरिए मतदान केंद्रों की निगरानी इस बात का संकेत है कि सरकार किसी भी तरह की कोताही को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है। वैसे ईवीएम पर आरोप तो लगने ही हैं। जीत का श्रेय तो सभी लेते हैं लेकिन हार का गरल तो कोई विरला ही पीता है। जो दल अपनी हार का आत्ममंथन करते हैं, पराजय उनके गले की हड्डी बन जाती है। समस्या जहां हो, उसका उपचार भी वहीं होना चाहिए। फुनगी को पानी देने से पौधा सूखता ही है। राजनीति पर भी यही बात लागू होती है। दावा यह किया जारहा है कि यह चुनाव देश की जनता लड़ रही है। हर बार चुनाव जनता ही लड़ती रही है। वही जीतती रही है। वही हारती रही है। विडंबना यह है कि इससे पहले राजनीतिक दलों ने इस बात को स्वीकारा नहीं था। जीत-हार पर उनका वर्चस्व हावी रहा लेकिन इस बार अगर हर दल इस चुनाव का देश का चुनाव कह रहा है तो यह अपने तरह की स्वीकारोक्ति है। इसे बड़ी पहल के रूप में देखा जा सकता है। सुभाष चंद्र बोस और स्वामी विवेकानंद को राजनीतिक दल जिस तरह तरजीह दे रहे हैं, उसे आस्था का सैलाब मानें या सोची-समझी रणनीति लेकिन संविधान और लोकतंत्र की सुरक्षा के बहाने जिस तरह एक दूसरे पर राजनीतिक और वैचारिक हमले किए जा रहे हैं, उसके असल नतीजे तो 4 जून को आएंगे। मतदाता दो दिन बाद अंतिम चरण के मतदान में प्रत्याशियों के चयन पर अपनी सहमति और असहमति की मुहर लगा देंगे। मंगल को तो बस तेल और उसकी धार ही देखनी शेष रहेगी।

















