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न्याय व्यवस्था पर सवाल कितना उचित?

-सियाराम पाण्डेय 'शान्त'

Janveena News by Janveena News
May 23, 2024
in विचार वातायन
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न्याय व्यवस्था पर सवाल कितना उचित?

भारतीय संस्कृति  अपरिग्रह की रही है। धन आवश्यक है लेकिन उसकी प्राप्ति का तरीका न्याय सम्मत, विवेक संगत और धर्म संगत होना चाहिए। यहां संतोष धन को सबसे बड़ा धन कहा गया है। ‘जब आवै संतोष धन सब धन धूरि समान।’ नीति ग्रंथों में भी लिखा गया है कि ‘संतोषं  परमामास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत। संतोष मूलं हि सुखं दुखमूलं विपर्यय:।’ मतलब संतोष ही सुख का आधार है और असंतोष दुख की जड़ है। राजनीति में भी यही सिद्धांत लागू होता है। देश में जब चुनाव का माहौल हो तो लोकतंत्र, संविधान और न्याय की हिफाजत की बात  होना लाजिमी है।  चुनाव चाहे ग्राम पंचायत का हो, विधानसभा का हो या फिर संसद का, ये मुद्दे सर्वांगसम होते हैं। उभयनिष्ठ होते हैं। इन्हें नकारा नहीं जा सकता। चुनावी सभाओं में विपक्ष जहां सत्तापक्ष पर संंविधान को बदलने की साजिश करने का  भय दिखा रहा है, वहीं सत्ता पक्ष कह रहा है कि उसके लिए तो संविधान ही सबसे बड़ा धर्मग्रंथ है। उसे बदलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।  विपक्ष का तर्क है कि फिर संसद में ज्यादा सीटों की दरकार क्यों हैं? ज्यादा सीटें जीतना गलत नहीं है। लोकतंत्र जनता के प्यार और सहयोग से मजबूत होता है। उसके विश्वास से मजबूत होता है। विरोध अगर सार्थक हो तो वह सत्तापक्ष पर अंकुश का काम करता है। उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है लेकिन  विरोध अगर पूर्वाग्रह से युक्त हो तो उससे देश के बनते हुए काम भी बिगड़ जाते हैं। विपक्ष को आत्ममंथन करना होगा कि  उसका विरोध सार्थक है या नहीं। जब हम देश की न्याय व्यवस्था पर अंगुली उठाते हैं। उसे बिकाऊ और सत्ता के दबाव में काम करने वाला बताते हैं तो जाहिर तौर पर हम न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों की सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता को संदिग्ध ठहराते हैं। इससे देश में कुंठा का जन्म होता है। जांच एजेंसियों को सरकार के हाथ की कठपुतली बताने वाला राजनीतिक समाज जब उन्हीं एजेंसियों से गंभीर मामलों की जांच कराने की मांग करता है तो वह कितना सही होता है, आत्ममंथन तो इस पर होना चाहिए। कोई कह रहा है कि पूरी भाजपा सिर्फ दो लोगों की बदौलत चल रही है तो उन्हें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि उनके अपने दल में क्या हालात हैं? ऐसे अनेक दल हैं जो एक परिवार तक ही सिमट कर रह गए हैं। जो दल अपने परिवार के हितों के धरातल से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं, उनसे समग्र भारत के उत्थान की कल्पना कैसे की जा सकती है? इस देश में कभी सत्ता में रहे मौजूदा विपक्ष की भी कार्यपद्धति देखी है और मौजूदा सरकार की भी कार्यपद्धति देखी है। इसलिए नानी के आगे ननिहाल का बखान न किया जाए, यही उचित है। जिनके अपने घर शीशे के होते हैं, उनसे इतनी तो अपेक्षा की ही जानी चाहिए कि वे  दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेकेंगे। अदालतों के निर्णयों से सत्ता पक्ष भी असहज होता रहा है लेकिन न्यायपालिका के आदेशों को विनम्र होकर सुधारने की भारतीय परंपरा है और इसका सम्मान तो होना ही चाहिए । भारत में तो जब तक वादी-प्रतिवादी न्याय से संतुष्ट न हो जाएं तब तक उन्हें ऊपरी अदालतों का दरवाजा खटखटाते रहने की इजाजत है। न्यायाधीश तटस्थ होकर न्याय करते हैं, इसलिए उन पर सवाल उठाना न्याय के दरवाजों को संकरा करना है। लोकतंत्र में जनता संप्रभु होती है। वह न्याय का सम्मान करती है लेकिन उस संप्रभु जनता के लिए उसी द्वारा चुनी गई सरकार को अगर न्याय व्यवस्था पर ऐतराज हो तो इसे क्या कहा जाएगा? आदतन अपराधी और किशोर  अपराध के मामले में एक जैसे फैसले नहीं दिए जा सकते। बच्चों को सुधरने का मौका मिलना चाहिए। इसमें गरीबी और अमीरी के उत्स तलाशना उचित नहीं है।  अच्छा होता कि इस देश के राजनेता निर्णय की परिस्थितियों पर भी विचार  करते। वैसे भी इन दिनों विपक्ष की रैलियों में जिस तरह की अराजकता का आलम है। उसे  रोकने की जरूरत है। सत्ता से दूर है, तब अगर ऐसा व्यवहार है तो सत्ता पाने के बाद तो राज मद सिर चढ़कर ही बोलेगा? सत्ता कुछ भी करने का अधिकार पत्र नहीं है। वह विवेक पूर्वक निभाया जाने वाला दायित्वबोध है। जब तक इस पर विचार नहीं होगा, अंतर्द्वंद्व यथावत रहेगा। सत्ता से ही समस्या हल नहीं होती,उसके लिए सत्ताशीन व्यक्ति का विवेकशील होना जरूरी है। ममता बनर्जी जब ओबीसी आरक्षण के मामले में कोलकाता हाईकोर्ट के फैसले को न मानने की बात कर रही है तो यह संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए कितना उचित है। इस फैसले में केंद्र का दबाव होने का आरोप तो लगाया जा सकता है लेकिन अति पिछड़ों के आरक्षण में छेड़छाड़ की राजनीतिक शरारत क्यों नहीं दिखाई देती? दूसरे पर अंगुली उठाना ठीक है लेकिन अपनी ओर उठी तीन अंगुलियों के संदेश भी ग्रहण करने चाहिए। यही आत्म सुधार का मार्ग है।

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