आम धारणा है कि मां लक्ष्मी दीपावली के अवसर पर ही धरती लोक पर आती हैं। जिन परिवारों में स्वच्छता, सज्जनता, सदाशयता, सत्यनिष्ठा, कार्य के प्रति समर्पण,कर्तव्य परायणता और सहभागिता का माहौल देखती हैं, जहां उन्हें ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी, नैतिकता नजर आती है, समय संयम, अर्थ संयम, इंद्रिय संयम और विचार संयम की बहुलता दिखती है, उस घर में वे प्रसन्नता से निवास करती हैं। अपने एक अंश से वे वर्ष भर उन घरों में रहतीं और प्रगति की कारक बनती हैं। जहां जिन घरों में इसके विपरीत आचरण होता है, वहां उनकी बहन दरिद्रा निवास करती हैं। लोकतंत्र पर भी यही बात लागू होती है। यहां प्रशंसा और आलोचना भी चीन्ह-चीन्ह कर होती है। देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि लक्ष्मी न तो साइकिल पर सवार होकर आती हैं और न ही हाथी पर और न हाथ पर। वे तो कमलासना हैं। कमल पर ही विराजित होती हैं। राजनीतिक लिहाज से शब्दों का यह जुगाड़ यानी कि तुकबंदी रोचक भी है और भाजपा के समर्थकों व प्रशंसकों को राहत भी देने वाली है लेकिन धार्मिक और आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह सिद्धांत पहले ही प्रयास में खारिज हो जाता है। ‘कराग्रे बसते लक्ष्मी, कर मध्ये सरस्वती’ वाला मंत्र तो इस देश के बहुत सारे लोग बिस्तर छोड़ने से पहले ही पढ़ते हैं। अष्ट लक्ष्मी स्वरूप में एक स्वरूप गज लक्ष्मी का भी है। इसमें लक्ष्मी जी हाथी पर सवार होती है। साइकिल जरूर लक्ष्मी जी की सवारी नहीं बन पाती। लोकतंत्र में कौन जीतेगा, कौन हारेगा, यह बहस मुबाहिसे का विषय है। कौन कितनी सीटों पर जीतेगा, इसका दावा करने में कोई बुराई भी नहीं है। एक बड़ी पार्टी के सुप्रीमो ने बड़ा तंज किया है कि अच्छा है कि प्रधानमंत्री चार सौ पार की ही बात कर रहे हैं, उन्होंने छह सौ सीटें जीतने की बात नहीं कीं। जब उतनी सीटें हैं ही नहीं, उन्हें जीतने का दावा तो कोई सिरफिरा ही कर सकता है। एनडीए हो या फिर विपक्षी गठबंधन सभी के दावे यही हैं कि जीत उनका ही गठबंधन रहा है। सभी जीत रहे हैं। हार कोई नहीं रहा है। यही मौजूदा चुनावी वक्त की नजाकत भी है। ‘दिल बहलाने को गालिब खयाल अच्छा है।’ एक संसदीय क्षेत्र में प्रत्याशी बहुतेरे होते हैं लेकिन उनमें से जीतता कोई एक ही है लेकिन अगर पहले ही दिन यह मान लिया जाए कि हमें तो जीतना नहीं तो संघर्ष बदमजा हो जाता है। न चुनाव लड़ने वाले को आनंद आता है और न ही लड़ाने वालों को। उत्साह का टेंपो चुनाव नतीजे तक बनाए रखना ही तो राजनीति है। विपक्ष का तर्क है कि मोदी सरकार ने देश में कुछ भी अच्छा नहीं किया है। देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। जनता उससे नाराज है फिर तो विपक्ष को कहीं कोने में बैठकर चैन की वंशी बजाना चाहिए। लोकतंत्र में तो जनता ही सर्वोपरि है। उसने ही कंधा पकड़कर बैठाया था, वही कान पकड़ कर बाहर कर देगी। ऐसे में विपक्ष की तो कोई भूमिका ही नहीं है। उसे अगर पता है कि चार चरणों में जनता ने भाजपा को सबक सिखा दिया है तो भी उसे धैर्य से काम लेना चाहिए लेकिन उसके बाद भी विपक्ष अगर व्यग्र भारत की भूमिका में है तो समझना कि उसे खुद पर यकीन नहीं है। जनता काम देखती है। वह विपक्ष और सत्तापक्ष को बेहद करीब से जानती है। इसलिए उसे ही निर्णय करने दें। बेकार की भाग दौड़ से अपना ही नहीं, जनता का भी कीमती वक्त जाया ही होना है। लक्ष्मी के बिना तो कोई भी काम नहीं सधता। चुनाव की सफलता भी लक्ष्मी जी की कृपा पर ही निर्भर करती है। नीति कहती है कि पैसा ही धर्म, कर्म और सबसे बड़ी तपस्या है। टका धर्म: अका कर्म: अका एव परमं तप:। यस्य गेहे टकान्नास्ति हा टका टकटकायते। एक नेता तो देश की महिलाओं को उनके गठबंधन की सरकार बनने पर टकाटक एक लाख रुपये वार्षिक देने के वायदे कर रहे हैं। वायदे पूरा होंगे और धन आएगा कर्म से। इसलिए भी जरूरी है कि लक्ष्मी जी का सम्मान हो, न कि उन्हें राजनीति में घसीटा जाए।

















