सातवें चरण के मतदान के बाद आए एक्जिट पोल ने विपक्ष के माथे पर पसीने ला दिए हैं। एक्जिट पोल करने वाली अधिकांश एजेंसियों का अनुमान है कि भाजपा स्पष्ट बहुमत की सरकार बन रही है। यह और बात है कि एक भी सर्वेक्षण में भाजपा को चार सौ पार करता दिखाया नहीं गया है लेकिन उसकी जीत की हैट्रिक ही अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। विपक्ष भले ही एक्जिट पोल और एक्जैक्ट पोल का हवाला दे रहे हों और यह कहें कि उसने भाजपा को चार सौ पार नहीं जाने दिया, ऐसा विचार कर वे मन बहलाने को गालिब खयाल अच्छा है की रीति-नीति पर चलना मौजूदा वक्त की जरूरत मान रहे हों लेकिन सच से वे भी बखूबी वाकिफ हैं कि जनता कुछ बिंदुओं पर मोदी सरकार से असंतुष्ट जरूर थी लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उसके मन में नाराजगी का भाव बिल्कुल भी नहीं था। यह तो विपक्ष ही था जो जनता को सरकार के प्रति भड़काने और उसे डराने की यथासंभव कोशिश कर रहा था। ज्यादातर सट्टा बाजार भी देश में राजग की सरकार बनाते नजर आ रहे हैं। जिस मुस्लिम समाज पर विपक्षी दलों को भरोसा था, मतदान के पूर्व और पश्चात उनकी राय उन्हें हैरत में डालने वाली है। सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास का नरेंद्र मोदी का नारा उनकी कार्य संस्कृति में भी नजर आया है। मुस्लिम महिलाओं का नरेंद्र मोदी पर भरोसा पिछले कई चुनावों से सबके सामने है। अति दलितों और अति पिछड़ों के विकास को तरजीह देकर उसने कुछ दलों के परंपरागत मतों में पहले ही सेंध लगा रखी है। विकास और जनहितकारी योजनाओं में बिना किसी भेदभाव के जहां उसने सभी के हितों का ध्यान रखा है, इसका लाभ उसे मिल सकता है। चुनाव के असल नतीजे तो चार जून को आएंगे लेकिन मौजूदा एक्जिट पोल के सर्वे ने भाजपा को जहां मुस्कुराने का भरपूर मौका दे दिया है, वहीं विपक्ष इस मुद्दे पर बगलें झांकता नजर आ रहा है। घटते मत प्रतिशत से उसे थोड़ी उम्मीद थी लेकिन लगता नहीं कि इसका भी विपक्ष को कोई खास लाभ होता नजर आ रहा है। दक्षिण के राज्यों में भाजपा की बढ़ती राजनीतिक पैठ भी उसके लिए विशेष चिंता का सबब है। बंगाल में जिस तरह छिटपुट हिंसा के बीच ईवीएम और वीवीपैट मशीन लूटी गई और उसे तालाब में फेंक दिया गया, उसकी जितनी भी आलोचना की जाए, कम है। यह हार की संभावना से उपजी बौखलाहट नहीं तो और क्या है? हारा हुआ व्यक्ति बेहद खतरनाक होता है और अपनी हार का बदला लेने के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि चार जून को जब नतीजे आएंगे तो पराजित नेता उसे मतदाताओं का आशीर्वाद समझ कर स्वीकार करेंगे और कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे देश की छवि खराब हो। लोकतंत्र में जीत और हार सामान्य बात है लेकिन जिंदगी यहीं खत्म नहीं होती। सत्ता में रहकर भी और सत्ता से बाहर रहकर भी देश की सेवा की जा सकती है। देश सेवा करने के लिए सेवादार का हृदय निर्मल होना चाहिए। हार इस बात का संदेश देती है कि हम जनता जनार्दन की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए।

















