आपदा में अवसर तलाश लेना अपने तरह की अलग राजनीति है। आपदा हो तो जन सहानुभूति का लाभ सहज ही मिल जाता है। इसके लिए अलग से श्रम करने की जरूरत नहीं होती। आज की राजनीति जरा अलग किस्म की है जिसमें नेता खुद टेंशन नहीं लेता, दूसरों को टेंशन देता है। अरविंद केजरीवाल व्यवस्था के हर मोर्चे पर विफल मुख्यमंत्री हैं लेकिन अपनी कमियों का ठीकरा मुख्यमंत्री बनने के दिन से आज तक दूसरे दलों पर फोड़ते रहे हैं। एक देहाती कहावत है – नाच न आवै आंगन टेढ़ा। सीएम अरविंद केजरीवाल ने जनता की सहानुभूति हासिल करने के अपने तईं हर जतन कर लिए। इसके लिए उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से भी अपील की कि उन्हें कई तरह की बीमारियां हैं। इसलिए सात दिन उनकी जमानत अवधि बढ़ा दी जाए, जिससे कि वे अपनी डॉक्टरी जांच करा सकें लेकिन प्रवर्तन निदेशालय ने इस पर आपत्ति दर्ज की कि अगर वे वाकई बीमार हैं तो चुनाव प्रचार के मैदान में क्या कर रहे हैं। दरअसल सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें जमानत चुनाव प्रचार करने की दलील पर ही दी थी। इसके बाद उन्होंने जनता से अपील की कि अगर इस चुनाव में वह इंडी गठबंधन को जिता देगी तो उन्हें जेल नहीं जाना होगा। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने नाराजगी भी जताई और कहा कि 2 जून को उन्हें तिहाड़ जेल में आत्म समर्पण कराना ही होगा। आतिशी और सौरभ भारद्वाज जैसे मंत्रियों ने भी आरोप लगाया कि अगर भाजपा सरकार बनी तो उन्हें जेल में डालकर मार दिया जाएगा। जितनी भी बेमतलब बातें हो सकती हैं, उतनी केजरीवाल और उनके सिपहसालार मंत्री कर रहे हैं। अब जब दिल्ली में जल संकट चरम पर है। जान-जोखिम में डालकर लोग टैंकरों की ओर भाग रहे हैं तो टैंकर माफिया के भ्रष्टाचार रोकने की दुहाई देने वाले केजरीवाल और उनके मंत्री टैंकर बढ़ाने की बात कर रहे हैं। पानी के दुरुपयोग पर लोगों पर जुर्माना लगाने की बात कर रहे हैं। केजरीवाल सरकार को पता है कि जब भीषण गर्मी पड़ती है तो नदियों और जलाशयों का जलस्तर कम हो जाता है। भूगर्भजल स्तर भी कम हो जाता है। लेकिन इसके बावजूद केजरीवाल सरकार की मंत्री आतिशी जिस तरह हरियाणा सरकार पर कम जलापूर्ति के आरोप लगा रही हैं, उसका हरियाणा सरकार ने भी प्रबल प्रतिवाद किया है। वे यही नहीं रुकीं, केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेधवाल और सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गईं। यहां तक कहा कि दिल्ली में पूरे देश के लोग रहते हैं, इसलिए यूपी और हरियाणा से और अधिक जल छोड़ने को कहा जाए। खैर, यह तो रही आतिशी की बात। केजरीवाल कह रहे हैं कि वे दो जून को आत्मसमर्पण करेंगे लेकिन दिल्लीवासियों और यहां रह रहे देशवासियों को परेशान नहीं होने देंगे। दरअसल आज की उनकी इस घोषणा का मतलब सातवें चरण की कई राज्यों की 57 सीटों पर वोट का संतुलन अपने पक्ष में बनाए रखना है या फिर इस बहाने भाजपा को शिकस्त देना है। इसमें वे कितने सफल होंगे, यह तो वही बेहतर बता सकते हैं लेकिन अब उनके राजनीतिक नाटक को यह देश बखूबी समझने लगा है। आपदा में अवसर तलाशना अच्छी बात है लेकिन उसमें जनहित का ध्येय सर्वोपरि होना चाहिए। किसी की राजनीतिक मुखरता और मौन राजनीतिक दलों की चिंता स्वाभाविक है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि विरोध के लिए विरोध किया जाए। नेताओं की अपनी विश्वसनीयता होती है और जो नेता अपना विश्वास खो देता है, उसकी स्थिति डाल से चूके वानर जैसी हो जाती है। आरोपों के भूंसे में विश्वास की सुई तलाशना कठिन काम है। कौन जीतेगा, कौन हारेगा, इस पर सभी राजनीतिक दलों के अपने दावे हैं। राजनीतिक दल चाहे जितनी भी पैंतरेबाजी क्यों न कर लें लेकिन मतदाताओं के निर्णय चार जून को यह बता देंगे कि कौन जनता के काम का है और कौन नहीं। हवाई रणनीति बनाने और बताने से कुछ भी होना-जाना नहीं है।

















