चुनाव प्रत्याशी के नाम और काम पर भी जीता जा सकता है। उसके चिंतन, चरित्र और कार्यशैली को भी जीत और हार का आधार बनाया जा सकता है लेकिन मौजूदा लोकसभा चुनाव भय, नफरत और अविश्वास की बिना पर लड़ा जा रहा है। विपक्ष का तर्क है कि भाजपा अगर फिर सत्ता में आई तो संविधान खत्म हो जाएगा। लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। इसके बाद देश में फिर कभी चुनाव होंगे ही नहीं। एक ओर यह तर्क कि भाजपा सत्ता में आ ही नहीं रही और दूसरी ओर आ गई तो जैसा खौफ फैलाना आखिर किस तरह का विरोधाभास है? जिसे जो समझ में आ रहा है, बोले जा रहा है। यह जाने-बूझे बगैर कि जो कुछ भी कहा जा चुका, कहा जा रहा है या भविष्य में कहा जाने वाला है, उसका आधार क्या है? बिना आधार के तो कोई भी सिद्धांत टिकता ही नहीं। समुद्र मंथन के लिए देव-दानव भी तैयार थे। मंदराचल जैसी मथानी और शेषनाग की रस्सी भी थी लेकिन आधार तो लेना ही पड़ा। इसके बिना तो बात बनी ही नहीं। कुछ राजनीतिक दल इस चुनाव को संविधान मंथन का हेतु मानते हैं। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि गुजरात में संविधान की शोभायात्रा निकालने से लेकर संसद में संविधान की पूर्व पीठिका के सामूहिक पाठ कराने तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी भूमिका रही है। जब उन्होंने सुस्पष्ट कर दिया है कि उनके जीवित रहते संविधान और आरक्षण को कोई खतरा नहीं हैं तो संविधान में तकरीबन 80 संशोधनों के पैबंद लगाने वाले किस मुंह से संविधान की हिफाजत की बात कर रहे हैं। अमीरों को बढ़ावा देने की शुरुआत दरअसल उन्हीं के कार्यकाल में हुई थी। बाल्टी की टूटी पेंदी में लोहे की चकत्ती लगाने वाले अगर स्टील कंपनियों के मालिक बन गए तो यह सब किसकी अनुकंपा से सुलभ हुआ। पेट्रोल पंप पर वाहनों में तेल डालने वाले देश के प्रमुख उद्योगपतियों में शुमार हुए तो इसके पीछे किसकी सरकार का हाथ था। अगर ईमानदारी के साथ देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का काम किया गया होता तो आजादी के सात दशक बाद आज भारत के विकास का मानचित्र कुछ और होता। भारत के साथ ही या उसके आसपास ही दुनिया के बाकी देश भी स्वतंत्र हुए थे लेकिन आर्थिक धरातल पर वे कहां हैं और हम कहां हैं, इसकी जवाबदेही आखिर लेगा कौन? कोई भी देश तब तरक्की करता है, जब सब काम करते हैं लेकिन यहां कमाता धोती वाला और खाता टोपी वाला है। जब तक इस अवधारणा को बदला न जाएगा, श्रम को सम्मान नहीं दिया जाएगा तब तक राष्ट्र विकास के हिमालय को कैसे छू सकता है? थाली में पानी डालकर चांद की परछाईं दिखाकर बच्चे को तो खुश किया जा सकता है लेकिन राष्ट्र तो तब खुश होता है जब उसके लोग अंतरिक्ष में जाएं, उसके रहस्यों के बारे में जानें-समझें। किसी रक्षा सामग्री का आयात अच्छी बात है लेकिन वैसी या उससे भी अच्छी रक्षा सामग्री बनाने की तकनीक हम जानें और उससे बेहतर सामग्री का निर्यात दुनिया के देशों को करें, हमारी सोच तो ऐसी होनी चाहिए। इसके लिए देश को प्रोत्साहित करने की जरूरत है लेकिन हम तो चुनाव की राजनीति में देश को डरा रहे हैं। राजनीति विश्वास चाहती है। लोक के प्रति समर्पण चाहती है। प्रत्याशी अपने नाम और काम से जब तक चुनाव नहीं जीतता, तब तक वह न तो देश का दिल जीत सकता है और न ही उसे विकास के पथ पर ले जा पाता है। भयादोहन से हम किसी के बढ़ते कदम तो खींच सकते हैं, उसे आगे नहीं बढ़ा सकते। राजनीति दरअसल विश्वास और भय का समवेत कारोबार है। वैसे भी देश में जिस तरह लोगों को डराने और अपना उल्लू सीधा करने के प्रयोग हो रहे हैं, वह प्रगति की ओर जाने वाला मार्ग तो नहीं है। देश मेल-मिलाप से ही आगे बढ़ेगा। शांति और सद्भाव से ही आगे बढ़ेगा लेकिन राजनीति से जुड़े लोगों को इतनी छोटी सी बात जानें कब समझ में आएगी।

















