यह संसार तपस्या से ही चलता है। ब्रह्मा जी तपस्या के बल पर ही संसार का सृजन करते हैं। तपबल से ही विष्णु जी जगत का पालन करते हैं और तपबल से ही भगवान शंकर संसार के संहार का दायित्व निभाते हैं फिर देश के नेताओं को तपस्या और साधना से भागना क्यों चाहिए और अगर कोई इस बहाने खुद को असीम ऊर्जा से भरा पाता है तो उसकी आलोचना क्यों की जानी चाहिए। राजयोग कितना भी हो जब तक उसमें ज्ञान, कर्म और भक्ति योग का समावेश नहीं होता, व्यक्ति यश, पद-प्रतिष्ठा से दूर ही रहता है। यह उसका अपना नजरिया है। इसमें संदेह नहीं कि लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण का प्रचार थम गया है। इसी के साथ चुनाव प्रचार में लगे बड़े नेता खाली हो गए हैं। गेंद अब सर्वथा मतदाताओं के पाले में है। चाहे जिता दे, चाहे हरा दे, जैसा भी चाहे नजारा दिखा दे। भाजपा के स्टार प्रचारक नरेंद्र मोदी कन्याकुमारी पहुंच गए और जिस शिला पर स्वामी विवेकानंद बैठे थे, उसी शिला पर वे ध्यान लगा रहे हैं। विपक्ष इस पर तंज भी कस रहा है कि चार जून को जब चुनाव नतीजे आएंगे तो वे कहेंगे कि उनकी तपस्या और ध्यान साधना में कदाचित कोई कमी रह गई थी। नीति भी यही कहती है कि पुरुषार्थी व्यक्ति को भाग्य के भरोसे नहीं बैठना चाहिए बल्कि अपने कार्य को पूरे मनोयोग से करना चाहिए। अगर इसके बाद भी सफलता न मिले तो देखना चाहिए कि पुरुषार्थ में कहां कमी रह गई। ‘दैवं विहाय कुरु पौरुषमात्म्यशक्त्या, यत्ने कृते यदि न सिध्यति कुत्र दोष:।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरसक प्रयास किया है। व्यक्ति कर्म करता है। फल देना ईश्वर के हाथ में हैं। इसलिए किसी की भी साधना पर अंगुली उठाना उचित नहीं है। कोई ऐसा राजनीतिक दल नहीं, जिसके नेता अपने इष्ट के चरणों में शीश न झुकाते हों। नवोन्मेष करना नरेंद्र मोदी का वैसे भी सहज स्वभाव है। वह ‘स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्या: सर्व मानवा:’ की अवधारणा के अनुरूप अपने कार्यव्यवहार और बोली-बानी से पूरी दुनिया को चौंकाते रहते हैं। इस घटना को भी इसी रूप में देखना चाहिए। चुनाव जीतने की तपस्या तो हर राजनीतिक दल ने की है। पसीना तो सभी ने बहाया है। एक संसदीय सीट पर एक ही प्रत्याशी जीतता है जबकि चुनाव कई दलों के प्रत्याशी लड़ते हैं। चुनाव हारने का यह मतलब हरगिज नहीं कि नेता कमजोर है। विजयी प्रत्याशी को मिले मतों और पराजित नेताओं को मिले मतों की तुलना करें तो पता चलेगा कि ज्यादातर जनता ने विजयी प्रत्याशी को खारिज किया होता है। इसलिए जीत-हार पर मुगालता पालने की जरूरत नहीं है। जनता जिसे भी अपना प्रतिनिधि चुने, जिस किसी भी दल को सरकार बनाने का अवसर दे, उसे जनता के समग्र विकास को लक्ष्य कर अपने काम को अंजाम देना चाहिए। मेरे पूर्वजों ने क्या किया था, यह बताने और जताने से अच्छा तो यह होगा कि हम अपने कार्य व्यवहार से अपने पूर्वजों का नाम रौशन करें। पिता ने घी खाया था, इसलिए अपना हाथ सुंघाने वालों के हाथ तो कुछ नहीं मिलता, उलटे हंसी का ही पात्र बनना पड़ता है। चुनाव के नतीजे आने में कुछ ही दिन शेष है । इसलिए राजनीतिक दलों को पक्ष और विपक्ष की दोनों ही जिम्मेदारियों के लिए अभी से तैयार हो जाना चाहिए। उसकी कार्ययोजना अभी से बना लेनी चाहिए। यही राष्ट्रहित का तकाजा भी है।

















