चुनाव नतीजे जब तक नहीं आ जाते तब तक उसके पूर्वानुमान पर चिंतित और हर्षित होने का कोई औचित्य नहीं है। अपनों का मनोबल बनाए रखने के लिए भी अनुमान को प्रमाण मान लेना खतरनाक है। एक लोकसभा में जितने लोग मतदान करते हैं, उससे भी बहुत कम लोगों से बातचीत कर कोई यह कैसे कह सकता है कि उसका सर्वे ठीक है और जन विश्वास और निष्पक्षता के करीब है। यह पहला मौका नहीं है जब कुछ राजनीतिक दलों ने इसे नकारा हो। इसे सरकार प्रायोजित कहा हो। हर चुनाव में इस तरह के हालात बनते रहे हैं लेकिन एक्जिट पोल करने वालों ने कभी हिम्मत नहीं हारी। वे तमाम आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच अपना काम करते रहे। यह कहते रहे कि जब पतीली का एक चावल पूरे चावलों के पकने की स्थिति बता देता है तो पूर्वानुमान गलत कैसे हो सकता है। इस बार भी एक्जिट पोल के नतीजों पर राजनीति गहरा गई है। विपक्षी गठबंधन को इन नतीजों पर विश्वास नहीं हो रहा है। उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस कर इस बात का दावा किया है कि सरकार तो उनकी ही बन रही है। इसलिए लोग मोदी एक्जिट पोल के झांसे में न आएं। उन्होंने तो यह भी बता दिया है कि उनका गठबंधन पूरे देश में 295 या उससे अधिक सीटें जीत सकता है। उम्मीदों पर दुनिया कायम है। नीति भी यही कहती है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। वैसे भी जिसका रिकॉर्ड हारने का रहा हो, उसमें जीत की उम्मीदें कुछ अधिक ही होती हैं। ऐसा अनेक बार हुआ है जब वास्तविक नतीजों के समक्ष वे पिट गए हैं लेकिन बहुधा ऐसा भी हुआ है जब चुनाव नतीजे एक्जिट पोल के आस-पास ही आए हैं। खैर, चुनाव नतीजे आने में बस एक रात का फर्क शेष है। चुनाव लड़ने वालों के लिए यही रात अंतिम है और यही रात भारी है। इसी से उनका राजनीतिक करिअर तय होना है। चुनाव में जीतना और हारना आम बात है लेकिन व्यवस्था को, चुनाव एजेंसी को, न्यायपालिकाऔर कार्यपालिका को हमेशा संदेह की नजर से देखना तो बिल्कुल भी तर्क संगत नहीं है। आर्षग्रंथों में कहा गया है कि आलोचना करने वाला निंदा का पात्र बन जाता है और प्रशंसा करने वाला कालांतर में महनीय हो जाता है। दूसरों के आचरण में खोट तलाशने वाला समाज आत्ममंथन करना भूल जाता है। जो अपने अंदर नहीं झांकता, वह बाहर की यूटोपियाई दुनिया में कुछ ऐसा खो जाता है कि बस घनचक्कर बनकर रह जाता है और उससे उबर नहीं पाता। राजनीति में जो भी दल सकारात्मक चिंतन से लैस रहता है, वह समाज, प्रदेश और देश के लिए तो हितकर होता ही है, अपना भी भला कर लेता है। देश सर्वोपरि है, जब तक इस भावभूमि से वहां का नेतृ वर्ग काम नहीं करता, देश की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। इसलिए वक्त के फेर को समझते हुए परम धैर्य से काम करना चाहिए। चुनाव के नतीजे अच्छे या बुरे जो भी हों। पक्ष में हों या विपक्ष में हों लेकिन देश तो अपना है। सत्ता की उतावली में देश की नीति और नीयत पर अंगुली उठाना किसी भी लिहाज से उचित नहीं है। अपना काम ईमानदारी से करना सबसे बड़ी राष्ट्रभक्ति है। अपमान के बीज बोकर वैसे भी सम्मान की फसल काटी नहीं जा सकती। बोया पेड़ बबूल का आम कहां से होय।

















