राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अयोध्या में रामलला के दर्शन कर लिए। इसी के साथ उन्हें लेकर विपक्ष द्वारा की जा रही राजनीति का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। तर्क यह दिया गया था कि उन्हें आदिवासी और अछूत समझकर रामलला के नवनिर्मित मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह से दूर रखा गया। अपने इस बयान के जरिए विपक्ष ने आदिवासियों और दलितों को गुमराह करने की भरसक कोशिश की लेकिन राष्ट्रपति ने रामलला के दर्शन कर राजनीतिक दलों की मंशा पर पानी फेर दिया है। राष्ट्रपति की उपेक्षा का आरोप बम पूरी तरह फुस्स हो गया है। देश में छुआछूत अब गुजरे जमाने की बात हो गई है और सामाजिक समरसता को लाने में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने बड़ी भूमिका अदा की है। दलित भोज की परिपाटी भी संभवत: वहीं से आरंभ हुई। वनवासी कल्याण आश्रमों के जरिए आदिवासियों की उसकी सेवा और उनके उत्थान की दिशा में किए गए उसके प्रयासों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। रही बात राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तो उसमें कितने यजमान दलित थे, अगर विपक्षी दलों ने इतनी छोटी सी बात पर भी विचार किया होता तो शायद वे इतनी बड़ी और गंभीर बात नहीं कहते। एक ओर तो वे देश में मोहब्बत की दुकान चलाने के दावे करते हैं और दूसरी ओर वे अपने अनर्गल प्रलापों के माध्यम से समाज को बांटने की राजनीति करते हैं। इस प्रवृत्ति की जितनी भी आलोचना की जाए, कम है। वैसे भी देश में जिस तरह भांति-भांति के मुद्दे उछाले जा रहे हैं, उससे राजनीतिक दलों को कदाचित कुछ लाभ मिल भी जाए लेकिन देश के हाथ में कुछ भी आना-जाना नहीं है।
पूरे देश में मजदूर दिवस मनाया गया। राजनीतिक दलों ने भी मजदूरोंके हितों की बात की। मजदूरों की कई प्रजातियां जिनमें श्रमजीवी भी थीं और बुद्धिजीवी भी, सबने अपने-अपने स्तर पर सरकार को अपनी मांगों का पुलिंदा सौंपा। सरकार भी चुनाव के इस मौसम में आश्वासनों की बयार बहाकर रह गई। आचार संहिता के इस दौर में कुछ ठोस तो कर सकती नहीं। श्रमिक श्रमजीवी तो हो सकता है लेकिन बुद्धिजीवी हरगिज नहीं हो सकता लेकिन अब कोई अपने को श्रमिक मानने को उतारू हो तो सरकार हां-नां के अलावा कर भी क्या सकती है। कुछ राजनीतिक दलों ने अलबत्ते मनरेगा मजदूरी बढ़ाने, अनुबंध पर मजदूरी रोकने की बात कही है लेकिन इससे तो बात बनने से रही। उन्हें राजनीतिक मजदूरों के समग्र हितों का भी विचार करना होगा। रो राजनीतिक मजदूर सौ-दो सौ रुपये की दिहाड़ी पर एक राज्य से दूसरे राज्य और एक जिले से दूसरे जिले की राजनैतिक रैलियों में ले जाए जाते हैं। उनकी सुविधाओं का राजनीतिक दल कितना ध्यान रखते हैं। रैली के बाद बहुधा आयोजक उन्हें बीच मंझधार में ही छोड़ देते हैं। इस बात की भी चिंता नहीं करते कि आखिरकार मजदूर भी उनके मतदाता हैं, भाग्य विधाता हैं। ऐसे में मजदूरों का प्यार और समर्थन किस दल को मिलेगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। धर्म, जाति के शोशे उछालकर राजनीतिक दल अपना उल्लू एकबारगी सीधा कर भी लें लेकिन सच तो यह है कि उनके लिए बस अपना हित ही सर्वोपरि है।

















