देश में एक ओर तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। सरकार को इस आधार पर घेरा जा रहा है। यह अपेक्षा की जा रही है कि भाजपा शासित केंद्र और राज्य सरकारें जनता के सवालों का जवाब दें। विपक्ष के आरोप हैं कि उसके नेताओं पर कार्रवाई इसलिए होती है कि वह जनता के मुद्दे पर सरकार को घेरती है। इसलिए उसके खिलाफ जांच एजेंसियों को लगा दिया गया है। वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री के बोलने पर सवाल उठ रहे हैं। उनसे पूछा जा रहा है कि बोल क्यों रहे हैं और न बोलने पर पूछा जाता है कि चुप क्यों हैं? यौन शोषण के आरोपों से घिरे प्रज्जवल रेवन्ना के बारे में कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री उन्हें खुद पकड़वाकर कर्नाटक सरकार को सौंप दें। प्रथम दृष्टया कानून व्यवस्था राज्य का विषय है। पहल तो उसे ही करनी चाहिए। जब उसमें कोई व्यवधान आए तो केंद्र से हस्तक्षेप की अपेक्षा की जानी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कब बोलना चाहिए, कहां बोलना चाहिए, क्या बोलना चाहिए, कितना बोलना चाहिए और क्यों बोलना चाहिए, इसे लेकर पूरा विपक्ष मुखर है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बिसात पर यह मुखरता कितनी सही है, विचार तो इस पर होना चाहिए। प्रधानमंत्री कौन से ईश्वर के दर्शन करेंगे, धरती पर करेंगे या समुद्र की अतल गहराइयों में करेंगे, केदारनाथ की गुफा में साधना करेंगे या गंगा आरती में भाग लेंगे, यह उनकी आस्था का विषय है। आस्था को सवालों के कठघरे में खड़ा करना तो वैसे भी उचित नहीं है। इतने बड़े देश में छिटपुट अपराध होते रहते हैं लेकिन हर घटना पर प्रधानमंत्री को ही जवाबदेह ठहराना न्यायसंगत तो नहीं है। एक ओर तो विपक्ष यह दावा करने का एक भी अवसर नहीं चूकता कि जनता भाजपा से नाराज है। प्रधानमंत्री की नीतियों से क्षुब्ध है। इस बार उसे सत्ता से बाहर कर देगी। अगर वाकई जनता में इतना आक्रोश है तो फिर विपक्ष के लिए परेशान होने की वैसे भी कोई वजह नहीं है। फिर एकजुटता दिखाने या अनावश्यक हाय-तौबा मचाने का भी कोई औचित्य नहीं है। हर मामले में जिम्मेदार बोलें ही, यह जरूरी नहीं लेकिन अगर कहीं राष्ट्रीय अस्मिता को चोट पहुंचाने की कोशिश हुई है तो सरकार की रणनीति पर गौर करना चाहिए कि वह किस तरह प्रतिवाद करती है लेकिन अपने देश में तो कुछ राजनीतिक दल सेना के शौर्य पर भी सवाल उठाने लगते हैं। वैसे भी जिस तरह एक दल विशेष के नेता की पड़ोसी दुश्मन देश प्रशंसा कर रहा है, चिंतन तो उस पर होना चाहिए। लोकतंत्र में कौन कितनी सीटें जीतेगा,कौन कितनी सीटें हारेगा, इस अंतहीन बहस में उलझने की बजाय राजनीतिक दलों को अपनी नीति, नीयत और क्रियान्वयन पर जोर देना चाहिए। यही वक्त का तकाजा भी है। जब हम यह कहते हैं कि प्रधानमंत्री तो पूरे देश के हैं,वे केवल अपनी पार्टी के लिए प्रचार क्यों करते हैं तो वे एक तरह से उन पर ज्यादती करते हैं। उनकी पार्टी जीतेगी तभी तो वे पीएम बनेंगे। अस्तित्व के मामले अनर्गल सवालों के पालड़े और बटखरे से नहीं तौले जाते।

















