कौन कहता है कि इस लोकसभा चुनाव में मुद्दे नहीं हैं। मुद्दे तो हर चरण के चुनाव में प्रमुखता से उभरते हैं और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। कुछ मुद्दे पानी के बुलबुले की तरह उठते और तिरोहित भी हो जाते हैं। बीते चार चरणों के चुनाव तक गंगा राजनीति का विषय नहीं थी लेकिन गंगा सप्तमी के दिन उन पर राजनीति चरम पर पहुंच गई है। गंगापुत्र कौन है, कौन नहीं, यह सवाल राजनीति की वादियों में प्रमुखता से तैर रहा है। कौन गंगा की पवित्रता को लेकर कितना गंभीर है, अब तो यह मुद्दे भी उछाले जा रहे हैं। वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी वाराणसी आए थे और कहा था कि उन्हें मां गंगा ने बुलाया है। यह बात अन्य राजनीतिक दलों को तब भी नहीं पची थी और अब जब वे कह रहे हैं कि अब गंगा ही उनकी मां है तो भी नहीं पच रही है। ऐसे में राजनीति तो होनी ही थी। गंगा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। जीवन के आरंभ और अंत तक लोकजीवन में गंगा की बड़ी भूमिका है। गंगा नदी ही नहीं, वह मां भी है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता की जननी भी है। संवाहक भी है। वह जीवनदायिनी ही नहीं, जीव-जगत की उद्धारकारिणी भी हैं। गंगा सप्तमी के दिन जब पूरा देश गंगा का पूजन कर रहा है। आरती-वंदन कर रहा है। ऐसे में उन्हें राजनीति के दलदल में घसीटने की भी नापाक कोशिश की गई है। वाराणसी में कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय ने गंगा सप्तमी पर मां-गंगा में स्नान किया। उनका पूजन-अर्चन किया और कहा कि हम बनारसियों के लिए गंगा श्रद्धा और आस्था का विषय है जबकि नरेंद्र मोदी के लिए गंगा की आराधना इवेंट है। गंगा के असली पुत्र मांझी समाज के लोग हैं और वे क्रूजों की भरमार से परेशान हैं। उनकी रोजी-रोटी छिन रही है। कांग्रेस का आरोप तो यह भी है कि मोदी सरकार में गंगा की सफाई पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए लेकिन गंगा और मैली हो गई है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी दशाश्वमेध घाट पर मां गंगा का पूजन किया और कहा कि गंगा उनकी मां है। उनकी मां के निधन के बाद तो अब गंगा ही उनकी मां रह गई हैं। गंगा और काशी की सेवा ही उनके जीवन का अभीष्ट है।
गंगा के शुद्धीकरण का अभियान तो राजीव गांधी के कार्यकाल में ही शुरू हुआ था। वाराणसी के राजघाट पर करोड़ों रुपये मूल्य के कछुए कागजों में छोड़े गए थे। तर्क दिया गया था कि कछुए प्रदूषण फैलाने वाले कीटों को खा जाएंगे लेकिन जब जाल डाला गया तो वाराणसी से विंध्याचल तक एक भी कछुआ नहीं मिला। तब कांग्रेस के नेताओं ने तर्क दिया था कि कछुए बहते हुए समुद्र में पहुंच गए होंगे। उसी दौर में गंगा जल, जल ही जीवन है जैसे अनेक स्वयंसेवी संगठन काशी में बने, जिनका मकसद गंगा को प्रदूषण मुक्त करना था, इस नाम पर करोड़ों रुपये की धनराशि एनजीओ संचालकों ने डकार ली। उस समय उन स्वयंसेवी संगठनों का जुड़ाव किस दल से था, यह भी किसी से छिपा नहीं है। सारे नाले गंगा में ही गिर रहे थे। गंगा को प्रदूषण मुक्त होना चाहिए, इस बात की चिंता सबको होनी चाहिए लेकिन गंगा पर राजनीति इस देश की आस्था पर चोट है और इसे यह देश हरगिज बर्दाश्त नहीं करेगा।

















