रामचरित मानस की एक चौपाई है-जस-जस सुरसा वदन बढ़ावा। तासु दुगुन कपि रूप देखावा। राजनीति की कसौटी पर जब इस चौपाई को कसते हैं तो पाते हैं कि आरोपों-प्रत्यारोपों की बढ़वार भी कुछ ऐसी ही होती है। इसमें लघुरूप की तो गुंजाइश ही नहीं हैं। जमीन से आसमान तक आरोपों की यह बढ़त सीधे-साद ेमतदाताओं की समझ पर भारी पड़ रही है। वह किस पर भरोसा करे और किस पर न करे। कोई गारंटी की थाल लिए खड़ा है तो कोई अपना बेटा ही जनता को समर्पित कर रहा है। अपनी कई पुश्तों के जुड़ाव का वास्ता दे रहा है। कोई पूरे देश को अपना परिवार बता रहा है। ऐसे में मतदाताओं के सामने भ्रम की स्थिति बनी है। कुछ राजनीतिक दलों पर कभी भाजपा टुकड़े-टुकड़े गैंग की मदद के आरोप लगाती रही। बदले समय में अब वे दल अपना आरोप उस पर चस्पां कर रहे हैं। चुनाव प्रचार की दिशा तय करने के भी राजनीतिक दल एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं लेकिन यह कहने में किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि वर्ष 2014 से आज तक राजनीति का मुद्दा तो नरेंद्र मोदी ही सेट करते रहे हैं। बाकी दल तो उसी मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमने को विवश होते रहे हैं। अभी हाल ही में उन्होंने कहा है कि रूस हो या अमेरिका, चीन हो या अब, वे अपनी शर्तों पर देश चलाते हैं। ऐसा व्यक्ति जब विपक्षी दलों के घोषणापत्र पर आक्षेप करता है और इससे देश के दिवालिया होने की आशंका जताता है तो उस पर प्रथम दृष्टया गंभीर विचार-मंथन की जरूरत महसूस तो होती ही है। इसमें शक नहीं कि आरोप और प्रत्यारोप अब राजनीतिक शिष्टाचार का अंग बन गए हैं। पहले राजनीति स्नेह -सहकार और सार्थक संवाद का जरिया हुआ करती थी लेकिन अब वह बात नहीं रही। येन-केन प्रकारेण मतदाताओं को प्रभावित करना ही आज की राजनीति का प्रमुख ध्येय है। राजनीतिक दल अपनी विजय सुनिश्चित करने के लिए जिस तरह मनोवैज्ञानिक दांव खेल रहे हैं, उसे बहुत हल्के में नहीं लिया जा सकता । कोई ऐसा राजनीतिक दल नहीं जो अपनी दुकान में मोहब्बत का सामान न रखता हो लेकिन नफरत का सामान भी वहां कम नहीं है। कौन जनता को भ्रमित कररहा है और कौन सही राय दे रहा है, यह समझ पाना जरा कठिन है। कौन अपना है, कौन पराया,यह तय करना भी आज की सबसे बड़ी चुनौती है। कोई दल और नेता ऐसा नहीं जो जनता को अपना परिवार न बताता हो लेकिन चुनाव जीतने के बाद कौन किसका कितना परिवारी है, कितना हमदर्द है, आजादी के बाद के जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें लोगों ने जान-समझ लिया है। चुनाव में नेताओं का प्रकट होना तो समझ में आता है लेकिन चुनाव बाद जनता से दूरी बनाना और लगभग अदृश्य रहना गले के नीचे नहीं उतरता। ऐसे में किसकी हैट्रिक बनेगी। कौन कीर्तिमान स्थापित करेगा हार का और जीत का, यह उतना मायने नहीं रखता। जनता के अपने दुख-दर्द हैं और नेताओं के अपने। नेताओं को अपने श्रेय और प्रेय की पड़ी है और जनता को अपने विकास के ध्येय की पड़ी है। सुख-सुविधाओं के जितने भी दावे-प्रतिदावे कर लिए जाएं लेकिन सुविधाएं कैसे मिल रही हैं, कितनी धारिता में मिल रही हैं, यह भी किसी से छिपा नहीं है। जिसे मिल रही हैं, इफरात मिल रही हैं, वह सुविधाओं के बोझ तले दबा जा रहा है और जिसे नहीं मिल रही हैं, वह उसे पाने के लिए दौड़-दौड़ कर थक चुका है। उसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं। प्रत्याशियों के दावे हैं कि वे अपने क्षेत्र को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा का हब बना देंगे, यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था लेकिन जब जागे तभी सबेरा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से कहा था कि हर सांसद एक गांव को गोद ले ले, उसे अति विकसित बना दे। मॉडल गांव बना दे। यही काम विधायक और ग्राम प्रधान किए होते। ब्लॉक प्रमुख करते, नौकरशाह करते। अपने ही गांव को जिसमें पैदा हुए, वहीं शिक्षा, स्वास्थ्य की गंगा बहा देते तो आज देश की तस्वीर कुछ और होती और बार-बार एक ही वादा दोहराने की जरूरत न पड़ती।

















