सांसद बन गए तो भी मिट्टी के कुल्हड़ ही बनाएंगे कल्लन?
-सियाराम पांडेय ‘शांत’
प्रतिनिधि चुनना हंसी-खेल नहीं है। यह बड़ी चुनौती है। जिसे चुना जाना है, वह विश्वसनीय है भी या नहीं, यह जानना-परखना बहुत जरूरी है। यह तभी संभव है जब राजनीतिक दल मतदाताओं पर यकीन करें, उसे अपना काम करने दें। असली और नकली के चक्कर में सोने जैसी बहुमूल्य धातु को भी आग में डालना पड़ता है। कसौटी पर कसना होता है। वहां जमा-जुबानी से काम नहीं चलता। कठिन परीक्षा होती है तभी शुद्धता का टैग लग पाता है। फिर नेताओं पर आंख मूंदकर विश्वास क्यों किया जाए? उनकी भी कठिन परीक्षा हो। उनकी अतीत की कार्य संस्कृति व उपलब्धियों पर गौर किया जाए। नीति कहती है कि भरोसा भरोसे के लायक पर ही करना चाहिए, वर्ना धोखा हो सकता है। किसी पर आंख मूंदकर भी भरोसा करना, पहले के विश्वास और आग्रह के आधार पर नई धारणा बनाना और इस आधार पर अपना नेता चुन लेना, उसके हाथ में घर की ताली थमा देना कदाचित उचित नहीं है। नीति तो यह भी कहती है कि जो विश्वसनीय हो, उस पर भी अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए। पता नहीं, कब किसकी नीयत बदल जाए। और जब जनप्रतिनिधि चुनना हो तो और भी सतर्कता जरूरी है।
गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि दुष्ट मिलने के बाद दुख देता है और सज्जन बिछुड़ने के बाद। ‘मिलत एक दारुन दुख देहीं। बिछुरत एक प्रान हर लेहीं।’ दुष्ट व्यक्ति भी जब किसी से मिलता है तो अत्यंत विनम्रता से मिलता है। अपने असली रंग तो वह बाद में दिखाता है। पूतना भी मां बनकर आई थी और बच्चों को जहर पिलाने लगी। आजकल हर राजनीतिक दल एक दूसरे के घोषणापत्र को छलावा कह रहा है। जब वही इसे संदिग्ध मान रहे हैं तो जनता एकबारगी उनके दावों को सच कैसे मान ले? फिर चुनाव रोज तो होता नहीं। जो काम पांच साल में एक बार होना है, उसके लिए जल्दीबाजी क्यों? आदमी मिट्टी का घड़ा खरीदता है तो भी ठोक-बजाकर देख लेता है। हमें तो अपना नेता चुनना है जो संसद में हमारी बात करेगा। मंत्री, प्रधानमंत्री बनेगा। देश की विधि व्यवस्था का मानक तय करेगा। ऐसे में किसी ऐरे-गैरे नत्थू खैरे को कैसे चुन लें? देश में वैसे भी ईमानदारों की कमी नहीं है। आजकल संकट यह है कि सत्ता के करीब पहुंचते ही नीति बदल जाती है। चुनाव बाद अपना आदमी अपना नहीं रह जाता, नजरें फेर लेता है। तभी तो कल्लन कुम्हार को चुनाव लड़ना पड़ता है। जब अपना ही नेता प्रणाम स्वीकार न करे तो इस तरह के हालात बनते ही हैं। कल्लन कुम्हार का दावा है कि वे सांसद बन गए तो भी मिट्टी के कुल्हड़ ही बनाएंगे। यह और जटिल बात है। लोकतंत्र में भावनाओं की कीमत लाजिमी है लेकिन सांसद चुना गया व्यक्ति और काम करे, यह इस देश को स्वीकार नहीं लेकिन जनप्रतिनिधि का आचरण आमजन के दिल को इतना दुखा दे कि वह चुनाव लड़ने को विवश हो जाए, यह अच्छी बात नहीं है। हर दल दावा कर रहा है कि उसका प्रतिद्वंद्वी हार रहा है। अगर ऐसा है तो हड़बड़ाहट क्यों? कौन डर रहा है, कौन निडर है, बहस का असल बिंदु तो यह है।

















