लंका में सब बावनवीर थे। कोई किसी से कम नहीं था। यह बात त्रेता युग की है। अब वहां के लोग सामान्य कद-काठी के हैं। बावनवीर वाली पीढ़ी रावण के साथ ही समाप्त हो गई लेकिन भारतीय राजनीति में बावनवीरों की पीढ़ी अभी भी जिंदा है। कद-काठी से सामान्य लेकिन शब्द बाण फेंकने में अर्जुन और कर्ण के बराबर। सभी चरित्र निष्ठा और ईमानदारी के बावन बीघे पुदीने बोए पड़े हैं। ऐसे में सच और झूठ का फर्क मुश्किल हो गया है। कोई किसी दल को सात समंदर पार फेंकने के दावे कर रहा है तो कोई किसी को पाकिस्तान जाने की नसीहत दे रहा है। कोई उत्तर प्रदेश की सभी लोकसभा सीटें जीतने के दावे कर रहा है तो कोई उसे सिर्फ एक सीट ही दे रहा है। यह एक सीट किसकी हो सकती है, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। यह लड़ाई मामा, राजा और महाराज तक ही सीमित होती तो भी गनीमत थी, लेकिन यहां तो संविधान मंथन ही चल रहा है। समुद्र मंथन से देवताओं को अमृत, विष और मदिरा ही नहीं, चौदह रत्न भी मिले थे, जिसे उभय पक्ष ने अपनी सुविधा के हिसाब से बांट लिया था। लोकसभा चुनाव जिस कथित संविधान मंथन के लिए हो रहा है, उससे किस राजनीतिक दल के हिस्से में क्या आएगा, इसे तो वही बेहतर बता पाएंगे। वैसे देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के प्रवक्ता ने इतना तो साफ कर दिया है कि अगर उनका गठबंधन सत्ता में आया तो दर्जनाधिक राज्यों में भाजपा की सरकारें तुरंत गिर जाएंगी। यह स्वत: होगा या इसके लिए संविधान की विशेष धारा का दुरुपयोग किया जाएगा। उस हालत में संविधान और लोकतंत्र किस भाव का पड़ेगा, इस बारे में अभी से सोचने की जरूरत है। लोकसभा चुनाव में वैसे भी जिस तरह अतीत के गड़े मुर्दे कब्र से बाहर निकाले जा रहे हैं, उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। रोड शो के जरिए राजनीतिक दल जातीय और मजहबी समीकरण साध रहे हैं। शहजादे और शहंशाह के तंज भरे संबोधन माहौल में तल्खी बिखेर रहे हैं। वहीं कुछ राजनीतिक दलों को एक दल विशेष की बी टीम भी कहा जा रहा है। जिन्हें बी टीम कहा जा रहा है, उनके कार्य व्यवहार से तो इसके संकेत भी नहीं मिलते। पैंतरेबाजी पर सभी राजनीतिक दल हैं, जिसे जहां जैसा मौका मिल रहा है, वह उसे उसी रूप में न केवल लपक रहा है बल्कि उसका इस्तेमाल अपने विरोधियों को चित करने में भी कर रहा है। नैतिकता की बात तो सभी राजनीतिक दल कर रहे हैं लेकिन एक दूसरे को नीचा दिखाने के जतन में कोई किसी से कमतर नहीं है। किसी के रोड शो में बुलडोजर का बोलबाला है तो कहीं पंक्चर बनवाने और साइकिल ही न रहने देने की धमकियां आम हो चली हैं। रेल मंत्री रहते लालू यादव पर कांग्रेस के दबाव में गोधरा पर रिपोर्ट बनाने के आरोप लगाए गए हैं। मोहब्बत और नफरत की वाचिक दुकान तो लंबे समय से चल रही हैं। अपनी सहूलियत के हिसाब से सभी एक दूसरे को पटखनी देने की फिराक में हैं। कुछ नेताओं के चरित्र पर आरोपों के बादल मंडरा रहे हैं तो कुछ बहत्तर छेद वाली चलनी का रुतबा हासिल करने के बाद भी बेधड़क दूसरे राजनीतिक दल को घेर रहे हैं। इस घेरने और आरोप बम फोड़ने के फेर में पदक किसके हाथ लगेगा, यह तो वक्त ही तय करेगा।

















