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भीड़ अनुशासित न हो तो परेशानीतलब

-सियाराम पाण्डेय 'शान्त'

Janveena News by Janveena News
May 20, 2024
in विचार वातायन
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चुनावी जनसभा में भीड़ का अपना महत्व है। भीड़ अनुशासित हो तो आयोजन में चार चांद  लग जाता है और अगर अनियंत्रित हो और अनुशासनिक मर्यादा के तटबंध तोड़ दे तो परेशानी का सबब बन जाती है। अपने लिए भी और जिस राजनीतिक दल के समर्थन में आई या जुटाई गई है, उसके लिए भी। भीड़ की जरा सी चूक आयोजकों को विरोध के कठघरे में खड़ा कर देती है। प्रयागराज जिले की फूलपुर संसदीय सीट पर भीड़ का व्यवहार न तो राहुल गांधी को पसंद  आया और न ही अखिलेश यादव को। नेताओं के लिए चुनाव काल का हर क्षण कीमती होता है और जब अपनी प्रिय जनता से अपने मन की भी बात न कर सके और उसी के समानांतर उनके प्रतिद्वंद्वी उसी जिले में उनकी बखिया उधेड़कर चले जाएं तो यह कष्ट और भी असहनीय हो जाता है। चुनावी सभा और रैलियों में भीड़ का अपना मनोविज्ञान होता है। भीड़ में सभी मतदाता हों, यह जरूरी नहीं । भीड़ में ज्यादातर श्रोता और दर्शक होते हैं। भीड़ कभी-कभी दूसरे जिलों और क्षेत्रों से भी आयातित होती है। भीड़ कम दिखने पर जनता पर मनोवैज्ञानिक असर तो पड़ता  ही है, प्रचारकों का उत्साह भी ठंडा पड़ जाता है लेकिन अनियंत्रित भीड़ तो नदी की उस जलधारा की तरह है जो तटबंध की मर्यादा में रही तो जीवनदायिनी होती है और तटबंध तोड़कर बहने पर  जानलेवा बन  जाती है।  विपक्ष को  क्या चाहिए आलोचना का अवसर और भाजपा ने इस अवसर को लपक लिया। कहा कि फूलपुर की जनता ने दो लड़कों की जोड़ी को बैरंग वापस कर आसमान दिखा दिया है। यह बेहद तल्ख टिप्पणी है। हालांकि चुनाव के दौर में राजनीतिक टिप्पणियां एक दूसरे को बेचैन ही  करती हैं। अरविंद केजरीवाल ने अपने पीए बिभव  कुमार को गिरफ्तार किए जाने के बाद भाजपा मुख्यालय को अपने पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ घेरने की कोशिश की लेकिन पुलिस बल ने आप पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को अपने पार्टी कार्यालय तक ही समेट दिया। केजरीवाल का आरोप है कि भाजपा उनके पूरे दल को कुचल देना चाहती है लेकिन वह ऐसा कर नहीं पाएगी क्योंकि उनकी पार्टी अपने आप में एक विचारधारा है। विचार को कोई मार नहीं सकता।  विचारवान होना अच्छी बात है लेकिन हमें इतना तो समझना ही चाहिए कि विचार के  भी दो पक्ष होते हैं। एक कुविचार और दूसरा सुविचार।  हम किसके साथ हैं। वैसे सुविचार ही सुखकारी हो सकता है। यश प्रदायक हो सकता है।  रायबरेली में एक मील का पत्थर लगा है जिस पर लिखा है वायनाड 2000 किलोमीटर।  विरोध का यह प्रतीकात्मक तरीका है जो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कहने की सामर्थ्य रखता है। अरविंद केजरीवाल अपने सत्तारोहण के दिन से ही अपने व्यवहार के लिए चर्चा के केंद्र में रहे हैं और अभी भी उनके व्यवहार में कहीं कोई कमी नहीं आई है। अच्छा होना अच्छी बात है लेकिन अच्छा होने का दंभ पाल लेना किसी भी लिहाज से उचित नहीं है। एक या दो नेताओं के विरोध के लिए आप पूरे देश  का विरोध नहीं कर सकते। उसकी विकास प्रक्रिया को खतरे में नहीं डाल सकते। पक्ष और विपक्ष ही लोकतंत्र का आधार हैं लेकिन दोनों के बीच संतुलन भी होना चाहिए।  प्रशंसा जितनी जरूरी है, उससे भी अधिक जरूरी है  आलोचना। आलोचना ही वह अंकुश है जो व्यक्ति को सही राह पर लाने की प्रेरणा देती है लेकिन प्रशंसा और आलोचना की भी अपनी मर्यादा होनी चाहिए। अच्छा होता कि प्रतीकों में विरोध होता, लेकिन अब जो जैसा भी है, उसका स्वागत तो करना ही पड़ेगा।

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