आरोपों के बहाने बढ़ती संविधान की अहमियत
-सियाराम पांडेय ‘शांत’
राजनीति ऐसी तुला है जहां कोई पलड़ा झुकता ही नहीं। झुुकाने के लिए अतिरिक्त पासंग रखना पड़ता है। वह इसलिए कि छुटभैया नेता भी खुद को किसी शहंशाह से कम नहीं समझते। नवली नवै न गहमर टरै वाली स्थिति है। संप्रति लोकसभा चुनाव आरक्षण और संविधान पर संकट को लेकर लड़ा जा रहा है। पक्ष-विपक्ष दोनों ही खुद को आरक्षण और संविधान का रक्षक बता रहे हैं और एक दूसरे को संविधान और आरक्षण का द्रोही ठहरा रहे हैं। इसके लिए सबके पास अपने-अपने तर्क हैं। बहत्तर छेद वाली चलनी भी इन आरोपों के बीच अपनी जगह बना ले रही है। जिनने संविधान की चादर पर संशोधनों के अनेक चकत्ते लगाए हों, वे भी अगर संविधान रक्षा की बात कर रहे हों तो इससे बड़ा आश्चर्य क्या हो सकता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने तो अपने हर प्रत्याशी से हाथ में संविधान की किताब लेकर चलने को कहा है, यह पहला अवसर होगा जब इस तरह का राजनीतिक नवोन्मेष इस देश में होने जा रहा है। हालांकि नरेंद्र मोदी ने भारतीय गणराज्य का प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार 2014 में संविधान की पूर्वपीठिका का सामूहिक पाठ कराया था जिसमें पक्ष और विपक्ष दोनों ही समवेत रूप से शामिल हुए थे। चलो, आरक्षण के समर्थन और विरोध की राजनीति के बहाने ही सही, कुछ प्रत्याशियों के हाथ में थोड़े समय के लिए संविधान की किताब तो होगी ही। अगर उन्होंने उसे जरा भी पढ़ लिया तो इससे उनका तो भला होगा ही, जनहित के प्रयासों को भी गति मिलेगी।
घपलों-घोटालों में जेल जा चुके लोग अदालतों में तर्क दे रहे हैं कि उन्हें चुनाव के वक्त पकड़ा गया। यह भारत देश है जहां अपराधी भी इस बात का दावा करने का साहस कर पाता है कि प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो उसे कब गिरफ्तार करे। मतलब गिरफ्तारी में भी सुविधा का संतुलन। और कदाचित गिरफ्तार हो ही गए तो जेल की नहीं, घर की रोटी चाहिए। महिलाओं से अभद्र व्यवहार के आरोप में अगर किसी को जेल हो जाए तो उसके समर्थक राजनीतिक दल यह कहना आरंभ कर देते हैं कि उसी की तरह का भ्रष्ट आचरण करने वाले दूसरे व्यक्ति को क्यों नहीं पकड़ा जा रहा। राजनीति भी तुलना का ही विज्ञान है। यहां का पूरा कारोबार ही नजीरों पर टिका है। लोक हितैषियों की प्रशंसा में नेताओं को संकोच हो सकता है लेकिन लोकनिंदित अपराध कर्म करने वालों को अपना नायक मानने में कोई गुरेज नहीं? अर्जुन और युधिष्ठिर की पूजा इस देश में भले न हो लेकिन दुर्योधन को पूजने वाले गांव तो मिल ही जाते हैं। ऐसी लोक मान्यता है कि प्रलय काल में सभी 49 पवन अपनी पूरी गति से बहते हैं। पुराणों की मानें तो लंका दहन के वक्त भी सभी प्रकार की वायु एक साथ बही थी लेकिन इस बात को अन्यथा न लें तो यह कहने में किसी को भी संकोच नहीं होना चाहिए कि चुनाव काल में सभी तरह के आरोप-प्रत्यारोप हवा में तैरते रहते हैं। अब इन आरोपों की हवा को कौन किस तरह पकड़ पाता है और उसे किस हद तक प्रचारित-प्रसारित कर पाता है, यह उसका विवेक और कौशल है। लोहा गर्म हो तो उस पर हथौड़े का प्रहार कर लोहे को सही आकार दिया जा सकता है। राजनीति के साथ भी कमोवेश यही बात है। राजनीति वह शै है जो जड़ को चेतन साबित कर देती है और चेतन को भी जड़ बना देती है। आरोपों के बीज बोना और आनन-फानन में फसल काट लेने का कौशल राजनीति को छोड़ अन्य किसी भी विधा में नहीं है। अगर यह कहा जाए कि हाथ पर सरसों जमाने की कला सिर्फ राजनीति में ही है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सभी समस्याओं के सहज हल का दावा करते किसी भी राजनीतिज्ञ को संकोच नहीं होता। एक ओर जहां गरीबी मिटाने के दावे हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गरीबी मिटाने की ठोस सुचिंतित योजना पर भी गौर नहीं हो सका है। नेताओं को लगता है कि लोगों को मुफ्त सुविधाएं देने से उनकी गरीबी मिट जाएगी लेकिन गरीबी तो तब मिटती है जब हर हाथ में काम हो। मुफ्त की राजनीति तो देश पर भार ही बनती है।

















