गारंटी इस बात का विश्वास है कि जो कुछ भी कहा जा रहा है, उसे हर हाल में पूरा किया जाएगा, हालात चाहे जितने विषम क्यों न हों। गारंटी छोटी है या बड़ी, यह उतना मायने नहीं रखती जितना यह कि उसकी विश्वसनीयता कितनी है? गारंटी कौन दे रहा है? आजादी के बाद से आज तक कोई चुनाव ऐसा नहीं बीता जब देश में गरीबी हटाने और खुशहाली लाने के दावे न किए गए हों। देश से कितनी गरीबी हटी, कितनी खुशहाली आई, यह किसी से छिपा नहीं है। अलबत्ते, नेताओं की आय साल दर साल जरूर बढ़ती रही, उनके चुनावी संपत्ति के दावे तो कमोवेश इसी ओर इशारा करते हैं। गारंटी इस बार संसदीय चुनाव का प्रमुख मुद्दा है। हर राजनीतिक दल अपने स्तर पर देश के विकास की गारंटी दे रहा है और अन्य दलों की गारंटी को गुमराहकारी, जुमलेबाजी और वाचिक जुगाली करार दे रहा है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने गत दिनों कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गारंटी चाइनीज सामान की तरह है। जिस तरह चाइनीज उत्पादों की कोई गारंटी नहीं कि वह कब तक चलेगा, कुछ वैसे ही प्रधानमंत्री मोदी के दावे भी हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस की इस राय पर पलटवार करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गारंटी जहां पूरी तरह भारतीय है, वहीं राहुल गांधी की गारंटी चीनी है। इस बार का चुनाव भारतीय और चीनी गारंटी के बीच है। राहुल के चीन और पाक प्रेम पर भाजपा अक्सर सवाल उठाती रही है। सहयोगी दल भी उनके अभिकथन को बहुत गंभीरता से नहीं लेते रहे हैें। गठबंधन की मजबूरी और बात है। गारंटी बेहद निजी होती है। उसे पूरे होशोहवास में दिया जाता है। रिजर्व बैंक नोट धारकों को, सिक्का धारकों को संबंधित मूल्य का भुगतान करने की वचनबद्धता प्रकट करता है। इसे कहते हैं गारंटी। गारंटी वही दे सकता है जिसका आधार मजबूत हो। ‘यदि होता किन्नर नरेश मैं’ जैसे ख्याली पुलाव पकाने वाले गारंटी देने के अधिकारी वैसे भी नहीं होते। किसकी गारंटी और वारंटी में कितना दम है, यह तो चुनाव के बाद सुस्पष्ट हो जाएगा लेकिन इससे पहले अपनी-अपनी गारंटी का गुणानुवाद भी अनुचित नहीं है। गारंटी में जिस तरह देशी और विदेशी संपुट लगाए जा रहे हैं, वह कितना न्यायसंगत है, यह विचार का विषय है। एक आंकलन सत्ता पक्ष और विपक्ष की अतीत की उपलब्धियों और गतिविधियों से जरूर लगाया जा सकता है। वैसे भी गारंटी का मुद्दा लोकसभा चुनाव के पहले चरण तक तो खूब चला लेकिन अब तो मुसलमान और पाकिस्तान ही शनि ग्रह की तरह भारत के लोकसभा चुनाव में छाए हुए हैं। उद्धव ठाकरे और संजय राउत ने महाराष्ट्र में गठबंधन के सवाल पर यहां तक कहा है कि उनकी पार्टी छोटी नहीं है। दरअसल कोई भी पार्टी छोटी-बड़ी नहीं होती। छोटा और बड़ा होता है पार्टी के मुखिया और उसके पदाधिकारियों का दृष्टिकोण। संगठन की अपनी ताकत होती है और इस ताकत की बदौलत बड़े से बड़े काम चुटकी बजाते पूरे हो जाते हैं। दो चार की लाठी और एक का बोझ। देश प्रेम और सहकार की भावना से चलता है। अहंकार से वह टूट जाता है लेकिन इस समय देश को जाति-धर्म में बांटने की जो कोशिशें हो रही हैं, वह देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप तो नहीं ही हैं। गारंटी दी जाए लेकिन उसे पूरा कैसे करेंगे, इसे भी इस देश को तफ्सील से समझाने की जरूरत है। 15 मिनट पुलिस हटाने के बाद की गारंटी और 15 सेकेंड पुलिस हटाने की बात की गारंटी की वैसे भी कोई अहमियत नहीं है। परायों को अपना और अपनों को बेगाना बनाने की गारंटी तो कोई सिरफिरा ही दे सकता है। नस्लीय वक्तव्य सैम पित्रोदा के हों या अधीर रंजन के, देश को दुख ही देते हैं। तरकस से छूटे तीर और मुख से निकले शब्द वापस नहीं लौटते। इसलिए राजनीति में भी और देश के विकास की गारंटी देते वक्त भी वाणी का संयम बहुत जरूरी है। वाणी सध गई तो बाकी के तीन संयम- समय संयम, अर्थ संयम और इंद्रिय संयम का लक्ष्य आसान हो जाता है। गारंटी दी जाए लेकिन इस तरह कि उससे अहमन्यता का बोध न हो। संदेह और आरोप से भले ही किसी को दूरगामी लाभ न मिले लेकिन उसका नुकसान जरूर हो जाता है। आजकल चुनाव के फिसलने की बात हो रही है। चुनाव वक्त की तरह है। फिसलता ही रहता है लेकिन इसके आकलन में जल्दबाजी तो न करें।

















