लोकसभा चुनाव में सत्ता किसके हाथ से खिसक जाएगी और किसके साथ गलबहियां करेगी, यह तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा। वैसे जिस तरह कौन प्रधानमंत्री बनेगा और कौन नहीं बनेगा, इसे लेकर राजनीतिक दल अटकलों की बाजीगरी कर रहे हैं, उस पर आम मतदाता मुस्कुरा ही सकता है। हैट्रिक बनेगी दोनों तरफ। वह हार की भी हो सकती है और जीत की भी। तीन चरणों के मतदान में मतदाता ने किस दल पर कितना विश्वास किया है, यह वही जानता है लेकिन जिस तरह पक्ष और विपक्ष अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं, वह भी किसी चमत्कार से कम नहीं हैं।
चुनाव दरअसल रणनीति की सफलता और विफलता का खेल है। यहां जो जीता, वही सिकंदर। राजनीतिक दलों की कौन सी बात कब जनता को चुभ जाए और किस बात पर जनता रीझ जाए, यह पूरी तरह देश, काल और परिस्थिति पर निर्भर करता है। राजनीति में सभी शुभेच्छु ही हों या सभी विरोधी ही हों, ऐसा भी नहीं है। घर का एक भेदी भी विनाश का सबब बन सकता है। यहां तो सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के इधर से उधर जाने का सिलसिला सा चल पड़ा है। बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते रहे हैं कि नादान दोस्त से दानेदार दुश्मन सौ गुना अच्छा होता है। जिस दल में दोस्त ही काम बिगाड़ने वाले हों, उसके अपने ही दीपक उसे खाक करने को आमादा हों, वह दूसरों पर अंगुली उठाने की हिमाकत कैसे कर सकता है? सैम पित्रोदा, अधीर रंजन के बाद अब मणिशंकर अय्यर ने जिस तरह की बयानबाजी की है, उससे प्रधानमंत्री की कुर्सी अपने पक्ष में आती देख रही कांग्रेस के कसबल ढीले पड़ गए हैं। उसकी स्थिति भई गति सांप छछूंदर केरी, उगलत लीलत प्रीत घनेरी वाली हो गई है। मजबूरन उसे अपना बचाव करना पड़ रहा है। उसकी एक नेत्री का सवाल यह है कि चुनाव भारत में हो रहा है तो पाकिस्तान की बात क्यों की जा रही है। हाल ही में रूस ने आरोप लगाया था कि अमेरिका भारत के लोकसभा चुनाव में हस्तक्षेप कर रहा है। हालांकि अमेरिका ने इसका खंडन किया है लेकिन रूस को यह नहीं भूलना चाहिए कि कभी अमेरिका ने उस पर अमेरिका के चुनाव में हस्तक्षेप करने और डोनाल्ड ट्रंप की मदद करने का आरोप लगाया था तब रूस को सफाई देनी पड़ी थी। वैसे इन दिनों जिस तरह पाकिस्तान का राहुल प्रेम उमड़ रहा है,वह कम हैरतअंगेज नहीं है। कोई अगर सरकार को पाकिस्तान के परमाणु बमों की याद दिलाए, उससे अमृतसर तक के विकिरण प्रभावित होने का खौफ पैदा करे, कोई कहे कि पाकिस्तान के लोगों ने चूड़ियां नहीं पहन रखी हैं, वह भी वीर देश है तो इस पर केंद्र सरकार को प्रतिक्रिया तो देनी ही चाहिए। ऐसे में अगर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पाक अधिकृत कश्मीर की एक-एक इंच जमीन भारत की बता रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? चीन ने भारत की जमीन कब कब्जाई, किन परिस्थितियों में कब्जाई लेकिन जब इसकी जिम्मेदारी का ठीकरा मौजूदा सरकार पर फोड़ा जाएगा तो उसे भी अपना पक्ष रखने का हक है। ऐसे में यह कहना कि चुनाव के बीच पाक की बात क्यों की जा रही है, यह शत्रु देश की तरफदारी नहीं तो और क्या है?

















