इस देश को चुनाव की बलिहारी माननी चाहिए कि इस दौरान लोकतंत्र और संविधान दोनों ही जिंदा हो जाते हैं। वैसे पांच साल तो वे अर्द्ध मूर्च्छित ही रहते हैं। चुनाव में ही वे जागते हैं और राजनीतिक दलों के सिर चढ़कर बोलते हैं। यही वजह है कि हर राजनीतिक दल लोकतंत्र का ही दिन रात जप करते नजर आते हैं। यही वह समय है जब देश की जनता उन्हें सर्वोपरि लगती है। मतदाता भगवान से भी बड़ा हो जाता है लेकिन वोट पड़ते ही प्राथमिकता बदल जाती है। चुनाव में नेता मतदाताओं के बेहद करीब होते हैं और चुनाव बाद वे उससे उतना ही दूर होते चले जाते हैं। इस चुनाव में तो दादी और पोते की चर्चा भी प्रभावी रूप से सामने आई है। गरीबी हटाने के हवाले से पोते पर दादी के नारे को रटने के आरोप लग रहे हैं। संविधान की किताब कुछ लोग अपने साथ लेकर घूमने लगे हैं। मतलब साफ है कि संविधान पर अब संकट नहीं। जब संविधान सुरक्षित है तो कोई चाहकर भी लोकतंत्र का अनभल नहीं कर सकता। लोकतंत्र में सरकार और कानून दोनों ही जनता के होते हैं। जनता के लिए होते हैं। इस लिहाज से देखें तो जनता पर भी संकट नहीं। फिर संकट क्या है? संकट है जो सत्ता में है, सारा श्रेय उसके खाते में चला जाता है। श्रेय और प्रेय के इस खेल में जनता भी पिस रही है, लोकतंत्र और संविधान भी पिस रहा है। ‘दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय’ वाले हालात हैं। कबीर दास ने लोक लाज और कुल की मर्यादा को गले की फांसी करार दिया था और कहा था कि इससे पीछे हटने पर संसार में हंसी होती है। ‘लोक लाज कुल की मरजादा इहै गले की फांसी। आधा चलिकर पीछा फिरिहैं होइहैं जग में हांसी।’ समाजशास्त्री लोक लाज, आदर्श, सिद्धांत और मर्यादा को ही सांसारिक जीवन की सुखमयता का आधार मानते हैं। कबीर आध्यात्मिक चिंतक हैं । उनकी यह बात अध्यात्म वाले नजरिए से सही भी लगती है लेकिन संसार के हिसाब से तो मीराबाई की स्वीकारोक्ति ही अच्छी लगती है। ‘लोक लाज तजि नाची। मैं तो सांवरे के रंग राची।’ केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इससे मिलती-जुलती लेकिन बेहद पते की बात कही है कि लोकतंत्र लोक लाज से चलता है लेकिन कुछ दलों में लगता है कि लोक लाज और शर्मो हया बची ही नहीं है। कुछ दलों का तर्क है कि देश में लोकतंत्र बचा ही नहीं है। उनके शब्दों में कहने की कोशिश करें तो जब लोकतंत्र बचा ही नहीं है तो लोक लाज की जरूरत क्या है?
संविधान की हत्या करने के दावे इस देश में बहुत पुराने हैं। विपक्ष में जो भी दल रहा है, आजादी के बाद से आज तक, उसने यही बात कही है कि देश में संविधान नहीं बचा है। सरकार संविधान का गला घोंट रही है। विपक्ष ने हमेशा सीबीआई की कार्यशैली पर सवाल उठाया है लेकिन हर ज्वलंत मामले में सीबीआई जांच की मांग सबसे पहले वही करते रहे हैं। डकैत और बदमाश भी नहीं चाहते कि उनके दल में कोई बेईमानी या विश्वासघात करे फिर लोकजीवन में, राजनीति में जनता बेईमानी और कदाचरण को कैसे बर्दाश्त करे। जनता को मूल विषय से भटकाएं नहीं, नेताओं, राजनीतिक दलों के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब करने दें। किसी दल के लिए एक परिवार को टिकट देना ही मायने रखता है तो एक दल प्रदेश में ऐसा भी है कि जिसने मुस्लिम बहुल सीटों पर अपने ही परिवार को प्रत्याशी बनाकर उपकृत कर रखा है। हाल ही में देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ने भी गोंडा की कैसरगंज सीट से महिलाओं से यौन शोषण मामले के आरोपी पहलवान को तो लोकसभा का टिकट नहीं दिया लेकिन उनके बेटे को टिकट देकर यह संदेश भी दे दिया कि राजनीतिक शुचिता में उसका कोई जोड़ नहीं है लेकिन उनके बेटे को टिकट देकर यह भी साबित कर दिया कि इनके और न उनके ठौर। ज्यों-ज्यों तीसरे चरण का मतदान करीब आ रहा है, राजनीतिक तल्खी भी बढ़ रही है और आरोपों की धार भी तेज हो रही है। सभी आरक्षण के पक्षधर हैं लेकिन आरक्षण जरूरी क्यों है, इस पर बोलने को कोई तैयार नहीं।आजादी के बाद से कई गांवों के लोग नाव से वोट दे रहे हैं, इस बार भी देंगे। वे तो चुनावी बैतरणी पार हो जाएंगे लेकिन मतदाताओं का क्या, उनके लिए तो नाव ही सहारा है। गिरत-पड़त चढ़ि ऊंचा।


















